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________________ गाथा ६४] विदियगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा ५७ ____ ११६. असंखेज्जोवजोगिगभवाणमसंखेन्जदिभागपमाणत्तादो णेदेसिमसंखेज्जगुणत्तं घडदि त्ति णासंकणिज्ज, तहाभावे संते वि हेट्ठिमभवपरिवत्तेहिंतो उवरिमभवपरिवत्ताणमसंखेज्जगुणहीणत्तावलंबणेणासंखेज्जगुणत्तसाहणादो । तं जहा–एगो णेरइएसुप्पज्जमाणो दसवस्ससहस्साउएसुववण्णो । एवमुववण्णस्स संखेज्जोवजोगिगभवसलागा एका जादा । पुणो वि एदेणेव विहिणा दसवस्ससहस्सम्मि असंखेज्जवारमुप्पज्जिय तदो एगवारं समयुत्तरदसवस्ससहस्साउअभवम्मि उववण्णो । पुणो पुव्वणिरुद्धदसवस्ससहस्सियभवम्मि असंखेजवारमुप्पन्जिय तदो समयुत्तरभवम्मि विदियवार । मुववण्णो । पुणो वि एदेणेव विहिणा उप्पाइजमाणे समयुत्तराउअभवा वि असंखेजमेत्ता जादा । एवं संजादेसु पुणो एगवारं दुसमयुत्तराउअभवम्मि उववण्णो। पुणो पल्लट्टिय समयुत्तरभवम्मि समयाविरोहेण संखेजवारमुप्पन्जिय तदो विदियवारं दुसमयुत्तरभवम्मि उववण्णो। एवं णेदव्वं जाव दुसमयुत्तरभववियप्पा असंखेजा जादा त्ति । एवं तिसमयुत्तरादिभवेसु वि समुप्पाइय णेदव्वं जाव उक्स्ससंखेजोवजोगिगभवं पत्तो त्ति । तदो उक्कस्ससंखेजोवजोगिगभवम्मि समयाविरोहेणासंखेजवारमुप्पन्जिय पुणो एगवारं जहण्णपरित्तासंखेजमेत्तोवजोगिगभवम्मि समुप्पजइ । पुणो वि एदेण विहाणेण पुव्वुत्त $ ११६. शंका-क्रोधकषायके संख्यात उपयोगवाले भव असंख्यात उपयोगवाले भवोंके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं, इसलिए ये असंख्यातगुणे नहीं हो सकते ? समाधान--ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा होने पर भी अधस्तन भवपरिवर्तनोंकी अपेक्षा उपरिम भवपरिवर्तन असंख्यातगुणे हीन होते हैं, इसलिए इस तथ्यको ध्यानमें रखकर क्रोध कषायके असंख्यात-उपयोगवाले भवोंसे संख्यात-उपयोगवाले भव असंख्यातगुणे होते हैं यह सिद्ध किया है। यथा-एक जीव नारकियोंमें उत्पन्न होता हुआ दस हजारकी आयुवाले नारकियोंमें उत्पन्न हुआ। इस प्रकार उत्पन्न हुए जीवकी संख्यात-उपयोगवाले भवकी एक शलाका हुई। फिर भी इसी विधिसे दस हजार वर्षकी आयुके साथ असंख्यातवार उत्पन्न होकर तदनन्तर एक वार एक समय अधिक दस हजार वर्षकी आयुवाले भवमें उत्पन्न हुआ। पुनः पहलेके समान दस हजार वर्षकी आयुवाले भवमें असंख्यातवार उत्पन्न होकर तदन्तर एक समय अधिक दस हजार वर्षकी आयुवाले भवमें दूसरी वार उत्पन्न हुआ। फिर भी इसी विधिसे उत्पन्न कराने पर एक समय अधिक दस हजार वर्षकी आयुवाले भव भी असंख्यात हो जाते हैं । ऐसा हो जाने पर पुनः एक वार दो समय अधिक दस हजार वर्षकी आयुवाले भवमें उत्पन्न हुआ। पुनः लौटकर एक समय अधिक दस हजार वर्षकी आयुवाले भव में आगमानुसार संख्यातवार उत्पन्न होकर तदनन्तर दूसरी वार दो समय अधिक दस हजार वर्षकी आयुवाले भवमें उत्पन्न हुआ। इस प्रकार दो समय अधिक दस हजार वर्षकी आयुवाले भव विकल्प असंख्यात होने तक उत्पन्न कराते रहना चाहिए। इस प्रकार उत्कृष्ट संख्यात-उपयोगवाले भवके प्राप्त होने तक तीन समय अधिक आदि दस हजार वर्षकी आयुवाले भवोंमें भी उत्पन्न कराते हुए ले जाना चाहिए। तदनन्तर उत्कृष्ट संख्यात-उपयोगवाले भवमें आगमक उत्पन्न होकर पुनः एक वार जघन्य परीतासंख्यातप्रमाण-उपयोगवाले भवमें उत्पन्न होता है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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