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________________ ५३ गाथा ३४] विदियगाहामुत्तस्स अत्थपरूवणा वजोगिगाणं भवाणं विसयविभागो सम्ममुवसंदरिसिदो होदि, सुत्तुदिट्ठविसयादो उवरिमाणं सव्वेसिमेवासंखेजोवजोगियत्तदंसणादो। तत्तो हेडिमाणं च सव्वेसिं संखेजोवजोगियत्तुवलंभादो। १०९. संपहि सेसकसायाणं पि एवं चेव संखेज्जासंखेजोवजोगिगाणं भवाणं विसयविभागो उवसंदरिसियव्वो त्ति पदुप्पायणट्ठमुवरिमसुत्तमाह___* एवं माण-माया-लोभोवजोगाणं ।। $ ११०. जहा कोहस्स. जहण्णपरित्तासंखेजमेत्तोवजोगाणं विसओ परूविदो एवमेदेसि पि कसायाणं कायव्वं, अप्पप्पणो एगवस्सोवजोगेहिं जहण्णपरित्तासंखेज्जयस्स भागं घेत्तूण तत्थ भागलद्धमेत्तवस्सेहिं तदुप्पर्ति पडि विसेसाभावादो। संपहि एदस्सेवत्थस्स सुहावबोहणट्ठमेत्थ संदिट्टिमुहेण किं चि परूवणं कस्सामो। तं कथं ? तत्थ कोहस्स एगवस्सोवजोगा एदे २७, माणस्स एगवस्सोवजोगा एदे १८, मायाए एगसुत्रमें निर्दिष्ट किये गये भवसे आगेके सभी भव असंख्यात उपयोगवाले देखे जाते हैं। तथा उससे पूर्वके सभी भव संख्यात उपयोगवाले उपलब्ध होते हैं। विशेषार्थ—नारकियोंकी कितनी आयुके किस भव तक क्यों तो क्रोध कषायके संख्यात उपयोगकाल होते हैं और आगेके सब भवोंमें क्यों असंख्यात उपयोगकाल होते हैं इस बातका इस सूत्र द्वारा सम्यक् प्रकारसे निर्णय किया गया है । सामान्य नियम यह है कि एक अन्तर्मुहूर्तके भीतर क्रोधादि कषायोंका एक उपयोगकाल होता है, इसलिए एक बर्षके भीतर संख्यात हजार उपयोगकाल हुए। इस नियमके अनुसार इन उपयोगकालोंका जघन्य परीतासंख्यातमें भाग देने पर जितने वर्ष प्राप्त होंगे उतने वर्षका जो भव होता है उसमें नियमसे असंख्यात उपयोगकाल सुघटित हो जाते हैं। स्पष्ट है कि इस भवसे कम आयुवाले नारकियोंके जितने भव होते हैं उनमें क्रोध कषायके संख्यात उपयोगकाल ही प्राप्त होते हैं और पूर्वोक्त भव सहित आगेके जितने भव होते हैं उनमें क्रोध कषायके असंख्यात उपयोगकाल ही होते हैं। ६ १०९. अब शेष कषायोंके संख्यात उपयोगवाले और असंख्यात उपयोगवाले भवोंका विषय विभाग इसी प्रकार निर्णीत करना चाहिए इस बातका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * इसी प्रकार मान, माया और लोभकषायके उपयोगवाले भवोंका विषयविमाग जानना चाहिए। $ ११०. जिस प्रकार क्रोध कषायके जघन्य परीतासंख्यातप्रमाण उपयोगोंका विषय कहा उसी प्रकार इन कषायोंका भी करना चाहिए, क्योंकि एक वर्षके भीतर प्राप्त होनेवाले अपने-अपने उपयोगों अर्थात् उपयोगकालोंके द्वारा जघन्य परीतासंख्यातको भाजित कर वहाँ जो एक भाग लब्ध आवे तत्प्रमाण वर्षोंके द्वारा मान, माया और लोभ कषायके जघन्य परीतासंख्यातप्रमाण उपयोगकालोंकी उत्पत्ति होनेकी अपेक्षा उक्त कथनसे इस कथनमें कोई भेद नहीं है । अब इसी अर्थका सुखपूर्वक ज्ञान करानेके लिए यहाँपर संदृष्टि द्वारा कुछ कथन करेंगे। शंका-वह कैसे ? समाधान-प्रकृतमें क्रोधकषायके वर्षके भीतर प्राप्त हुए उपयोग ये हैं-२७, मान
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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