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________________ गाथा ६४ ] विदियगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा जोगा वा, जेसु वा संखेजा, एदेसिमट्ठन्हं पदाणमप्पाबहु | $ १०६. एत्थ णिरयगदीए ताव पयदपरूवणं वत्तइस्सामो त्ति जाणावणटुं णेरइयभवाणमहियरणभावेण णिद्देसो कओ 'जेसु णेरइयभवेसु' त्ति । ते च अट्टभेदभिण्णा । तं जहा — कोहस्स असंखेजोवजोगिगा, माणस्सासंखेजोवजोगिगा, मायाए असंखेजोवजोगिगा, लोभस्स असंखेज्जोवजोगिगा, कोहस्स संखेजोवजोगिगा, माणस्स संखेजोवजोगिगा, मायाए संखेज्जोवजोगिगा, लोभस्स संखेजोवजोगिगा चेदि । एदेसि - महं पदाणमदीदकालसंबंधेणप्पाबहुअं कायव्वमिदि सुत्तस्स समुच्चयत्थो । ५१ * तत्थ उवसंदरिसणाए करणं । $ १०७. किमुवसंदरिसणाकरणं णाम ? उवसंदरिसणाकरणं णिदरिसणकरणं frore करणमिदि एयट्ठो । कोहादिकसायाणं संखेजोवजोगिगाणमसंखेजोवजोगिगाणं च भवाणं विसयविभागजाणावणट्ट मुवसंदरिसणामुहेण किं पि अट्ठपदं पयदप्पा बहुअसाहणं वत्तइस्लामो ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्थो । * एक्कम्मि वस्से जत्तियाओ को होवजोगद्धाओ तत्तिएण जहण्णासंखेज्जयस्स भागो जं भागलद्धमेत्तियाणि वस्साणि जो भवो तम्हि लोभकषायके उपयोग असंख्यात होते हैं अथवा जिन भवोंमें ये सब उपयोग संख्यात होते हैं, उन आठों पदोंका अल्पबहुत्व इस प्रकार है । $ १०६. यहाँ नरकगतिमें सर्व प्रथम प्रकृत प्ररूपणाको बतलाते हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए नारकियोंके भवोंका 'जेसु णेरइयभवेसु' इस प्रकार अधिकरणरूपसे निर्देश किया है । और वे भव आठ प्रकारके हैं । यथा - क्रोध कषायके असंख्यात उपयोगवाले भव, मानकषायके असंख्यात उपयोगवाले भव, मायाकषायके असंख्यात उपयोगवाले भव, लोभ कषायके असंख्यात उपयोगवाले भव, क्रोध कषायके संख्यात उपयोगवाले भव, मान कषायके संख्यात उपयोगवाले भव, माया कषायके संख्यात उपयोगवाले भव और लोभ कषायके -संख्यात उपयोगवाले भव । इन आठों पदोंका अतीत कालके सम्बन्धसे अल्पबहुत्व करना चाहिए इस प्रकार सूत्रका समुच्चयरूप अर्थ है । * प्रकृतमें अब उनका निर्णय करते हैं । $ १०७. शंका–उपसंदर्शनाकरण पदका क्या अर्थ है ? - समाधान —— उपसंदर्शनाकरण, निदर्शनकरण और निर्णयकरण ये तीनों एक अर्थके वाची शब्द हैं । क्रोधादि कषायों के संख्यात उपयोगवाले और असंख्यात उपयोगवाले भवोंके विषयविभागका ज्ञान करानेके लिए उपसंदर्शनाद्वारा प्रकृत अल्पबहुत्वकी सिद्धि करनेवाले कुछ अर्थपदको कहेंगे यह इस सूत्रका भावार्थ है । * एक वर्षके भीतर क्रोध कषायके जितने उपयोगकाल होते हैं उनके द्वारा जघन्य असंख्यातको भाजित किया, जो भाग उपलब्ध आया उतने वर्षप्रमाण जो
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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