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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ वेदगो ७ सव्वपदा० लोग० असंखे भागो सव्वलोगो वा । एवं मणुसतिये । णवरि अवत्त० खेत्तं । देवेसु सव्वपदा० लोग० असंखे भागो अट्ठ-णव चोइस० देसूणा । एवं भवणादि जाव अच्चुदा त्ति । णवरि सगपोसणं । उवरि खेत्तं । एवं जाव० । $ ७४. कालाणु० दुविहो णि०-ओघेण आदेसेण य । ओघेण अवत्त० जह. एयस०, उक्क० संखेजा समया। सेसपदा० सव्वद्धा । एवं तिरिक्खा० । णवरि अवत्त० पत्थि । आदेसेण जेरइय० अणंतगुणवड्ढि-हाणि० सव्वद्धा । सेसपदा० जह. एयस०, उक्क० आवलि. असंखे०भागो। एवं सव्वणिरय०-सव्यपंचिंदियतिरिक्खदेवा जाव अवराजिदा ति । एवं मणुसेसु । गवरि अवत्त० ओघं । एवं मणुसपज्ज०-. मणुसिणी० । णवरि अवढि० जह० एयस०, उक्क० संखेजा समया । एवं सव्वट्टे । णवरि अवत्त० णत्थि । मणुसअपज० अणंतगुणवढि-हाणि० जह० एयस०, उक्क० कहना चाहिए। पहली पृथिवीमें स्पर्शन क्षेत्रके समान है। सब पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च और मनुष्य अपर्याप्तकोंमें सब पदसम्बन्धी अनुभागके उदीरकोंने लोकके असंख्यातवें भाग और सर्वलोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार मनुष्यत्रिकमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनमें अवक्तव्य पदका भंग क्षेत्रके समान है। देवों में सब पद सम्बन्धी अनुभागके उदीरकोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ और कुछ कम नौ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है। इसी प्रकार भवनवासियोंसे लेकर अच्युत कल्पतकके देवोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि अपनाअपना स्पर्शन कहना चाहिए । ऊपर क्षेत्रके समान भंग है। इसी प्रकार अनाहारक मागणा तक जानना चाहिए। विशेषार्थ-ओघसे मोहनीयको अवक्तव्य उदीरणा उपशमश्रेणिसे उतरते समय वा मोहनीयके अनुदीरकके मर कर देव होने पर प्रथम समयमें होती है। यतः ऐसे जीवोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्रमें ही पाया जाता है, इसलिए वह उक्त क्षेत्रप्रमाण कहा है । शेष कथन सुगम है। ७४. कालानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश। ओघसे अवक्तव्य अनुभागके उदीरक जोवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। शेष पदअनुभागके उदीरक जीवोंका काल सर्वदा है। इसी प्रकार तिर्यञ्चोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें अवक्तव्य पद नहीं है । आदेशसे नारकियोंमें अनन्त गुणवृद्धि और अनन्त गुणहानि अनुभागके उदीरक जीवोंका काल सर्वदा है। शेष पद अनुभागके उदीरक जीवोंका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इसी प्रकार सब नारकी, सब पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च और सामान्य देवोंसे लेकर अपराजित विमान तकके देवोंमें जानना चाहिए। इसी प्रकार मनुष्योंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनमें अवक्तव्य पदका भंग ओघके समान है। इसी प्रकार मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यिनियोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें अवस्थित अनुभागके उदीरकोंका -जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धिके देवोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनमें अवक्तव्य पद नहीं है। मनुष्य अपर्याप्तकोंमें अनन्त गुणवद्धि और अनन्तगुणहानि अनुभागके उदीरकोंका जघन्य काल एक
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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