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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [वेदगो७ जह० एयस०, उक्क० अंतोमु० । अवट्ठि० जह० एयस०, उक्क० असंखेजा लोगा । अवत्त० जह० अंतोमु०, उक्क ० उवड्डपोग्गलपरियट्ट । एवं तिरिक्खेसु । णवरि अवत्त० णत्थि । ४६. आदेसेण रइय० भुज०-अप्प० ओघं । अवढि० जह० एगस०, उक. तेत्तीसं सागरो० देसूणाणि । एवं सव्वणेरइय० । णवरि सगढिदी देसूणा । पंचिंदियतिरिक्खतिये भुज-अप्प० ओघं। अवढि० जह० एयस०, उक्क० सगढि० दे० । पंचिं०तिरिक्खअपज०-मणुसअपज भुज-अप्प०-अवढि० जह० एयस०, उक० अंतोमु० । मणुसतिए पंचिंदियतिरिक्खभंगो । णवरि अवत्त० जह० अंतोमु०, उक्क० पुव्वकोडिपुधत्तं । देवेसु भुज०-अप्प० ओघं । अवट्टि० जह० एयस०, उक्क० तेत्तीसं सागरो० देसूणाणि । एवं भवणादि जाव सव्वट्ठा त्ति । णवरि सगढिदी देसूणा । एवं जाव० । अन्तरकाल अन्तमुहर्त है । अवस्थित पदके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है। अवक्तव्य पदके उदीरकका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्ध पुद्गल परिवर्तनप्रमाण है। इसी प्रकार तिर्यञ्चोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें अवक्तव्य पद नहीं है। विशेषार्थ—प्रत्येक जीवके मोहनीयकी भुजगार और अल्पतर उदीरणा कमसे कम एक समयके अन्तरसे और अधिकसे अधिक अन्तमुहूर्त के अन्तरसे नियमसे होती रहती है, इसलिए इन पदोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण कहा है। किन्तु अवस्थित पद यदि न हो तो अधिकसे अधिक असंख्यात लोकप्रमाण काल तक नहीं होता, इसलिए अवस्थित उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण कहा है। तथा एक जीवकी अपेक्षा उपशम श्रेणिके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकालको ध्यानमें रखकर अवक्तव्य उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्ध पुद्गल परिवर्तनप्रमाण कहा है। तिर्यञ्चोंमें उपशम श्रेणिका होना सम्भव नहीं, इसलिए इनमें अवक्तव्य उदीरणाका निषेध किया है। ४६. आदेशसे नारकियोंमें भुजगार और अल्पतर उदीरणाका भंग ओघके समान है । अवस्थित उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम तेतीस सागरप्रमाण है। इसी प्रकार सब नारकियोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि कुछ कम अपनी-अपनी स्थिति कहनी चाहिए। पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चत्रिकमें भुजगार और अल्पतर उदीरणाका भंग ओघके समान है। अवस्थित उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम अपनी-अपनी स्थितिप्रमाण है । पञ्चेन्द्रिय तियञ्च अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्तकोंमें भुजगार, अल्पतर और अवस्थित उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है । मनुष्यत्रिकमें पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चके समान भंग है। इतनी विशेषता है कि अवक्तव्य उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल पूर्वकोटि पृथक्त्वप्रमाण है । देवोंमें भुजगार और अल्पतर उदीरणाका भंग ओघके समान है। अवस्थित उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम तेतीस सागर है। इसी प्रकार भवनवासियोंसे लेकर सर्वार्थसिद्धितफके देवोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि कुछ कम अपनी-अपनी स्थिति कहनी चाहिए। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए।
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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