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________________ गा० ६२] उत्तरपयडिपदेसउदीरणाए एयजीवेण अंतरं २३९ उवरि इथिवेदो गस्थि । अणुदिसादि सव्वट्ठा त्ति सम्म०-पुरिसवे० जह० पदेसुदी० जह० एयस०, उक्क० आवलि० असंखे०भागो। अजह. जह० एयस०, उक्क० सगद्विदी । बारसक०-छण्णोक० आणदभंगो । एवं जाव० । * एगजीवेण अंतरं। १५३. सुगममेदमहियारपरामरसवक्कं । * मिच्छत्तु कस्सपदेसुवीरगंतरं केविचरं कालादो होदि ? $ १५४. सुगमं । * जहण्णण अंतोमुहुत्त। 5 १५५. तं कथं ? अण्णदरकम्मंसियलक्षणेणागदसंजमाहिमुहचरिमसमयमिच्छाइद्विणा उक्कस्सविसोहिपरिणदेणुक्कस्सपदेसुदरीणाए कदाए आदी दिट्ठा । तदो संजमं गंतूणंतरिय सव्वजहण्णंतोमुहुत्तेण पुणो मिच्छत्तं पडिवजिय जहण्णंतराविरोहेण विसोहिमावूरिय संजमाहिमुहो होदूण मिच्छाइद्विचरिमसमये उक्कस्सपदेसुदीरगो जादो। नहीं है। अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोंमें सम्यक्त्व और पुरुषवेदके जघन्य प्रदेश उदीरकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अजघन्य प्रदेश उदीरकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अपनी-अपनी स्थितिप्रमाण है । बारह कषाय और छह नोकषायोंका भंग आनत कल्पके समान है। इसी प्रकार अनाहारक मागेणा तक जानना चाहिये। विशेषार्थ-अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देव नियमसे सम्यग्दृष्टि होते हैं, इसलिए इनमें सम्यक्त्वके जघन्य प्रदेश उदीरकका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण बन जाता है। कारण कि यहाँ पर सम्यक्त्वकी जघन्य प्रदेश उदीरणाके कारणभूत जो असंख्यात लोकप्रमाण परिणाम हैं उनमें एक जीवका अधिकसे अधिक आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काल तक अवस्थान बन जाता है। शेष कथन सुगम है। * एक जीवको अपेक्षा अन्तरकालका अधिकार है। ६१५३. अधिकारका परामर्श करानेवाला यह सूत्रवाक्य सुगम है। * मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेश उदीरकका अन्तरकाल कितना है ? ६१५४. यह सूत्र सुगम है। , * जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है। ६ १५५. वह कैसे ? अन्यतर कर्माशिक लक्षणसे आकर संयमके अभिमुख हुए उत्कृष्ट विशुद्धिसे परिणत अन्तिम समयवर्ती मिथ्यादृष्टिके द्वारा उत्कृष्ट प्रदेश उदीरणाके करने पर उसकी आदि दिखलाई दी। उसके बाद संयमको प्राप्त कर और उसका अन्तर कर सबसे जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल द्वारा पुनः मिथ्यात्वको प्राप्त कर जघन्य अन्तरकालके अविरोधरूपसे विशुद्धिको पूरा कर संयमके अभिमुख हुए मिथ्यादृष्टिके अन्तिम समयमें उत्कृष्ट प्रदेश उदीरक हो गया। इस प्रकार मिथ्यात्वके उत्कृष्ट प्रदेश उदीरकका जघन्य अन्तर काल अन्तमुहूते
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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