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________________ १५२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ वेदगो णवरि अवत्त० णदुसभंगो । एवं तिरिक्खा० । ४१३. आदेसेण णेरइय० मिच्छ. भुज-अप्प० पत्थि. अंतरं । अवडि० जह० एगस०, उक्क० असंखेजा लोगा । अबत्त० ओघं । एवं सोलसक०-सत्तणोक० । णवरि अवत्त० जह० एयसमओ, उक्क. अंतोमु० । गवुसय० अवत्त० गस्थि । सम्म०-सम्मामि० ओघ । एवं सध्वणेरइय० । एवं पंचिंदियतिरिक्तानिये । णवरि णवुस० अवत्त० ओघं । इस्थिवेदपुरिस. ओघं। णवरि पज. इत्यिवेदो पत्थि जोणिणीसु पुरिसवेद-णवुस० णस्थि । इत्थिवेद० अवत्त० गस्थि। ___४१४. पंचिंदियतिरिक्खअपज० मिच्छ०-सोलसक०-सत्तणोक० णारयभंगो। णवरि मिच्छ० अवत्त० णस्थि । 5 ४१५. मणुसतिये पंचिंदियतिरिक्खतियभंगो । मणुसिणीसु इस्थिवे. अवत. है। इतनी विशेषता है कि इसक अवक्तव्य पदके उदीरको क अन्तरकालका भंग नपुंसकवेदके समान है । इसी प्रकार तिर्यश्चों में जानना चाहिए। विशेषार्थ—इस अन्तरकाल प्ररूपणासे मालूम होता है कि वेदक सम्यक्त्वसे च्युत होकर कोई जीव अधिकसे अधिक सात दिन-रात तक मिथ्यादृष्टि नहीं होता और मिथ्वात्व को त्यागकर अधिकसे अधिक सात दिन-रात तक कोई जीव वेदक सम्यग्दृष्टि नहीं होता। इसी प्रकार अन्य वेदवाला कोई जीब मरकर यदि नपुंसकवेदी, स्त्रीवेदी या पुरुषवेदियों में नहीं उत्पन्न हो तो अधिकसे अधिक चौबीस मुहूर्त तक नहीं उत्पन्न होता। शेष कथन स्पष्ट ४१३. आदेशसे नारकियों में मिथ्यात्वके भुजगार और अल्पतर पदके उदीरकों का अन्तरकाल नहीं है । अवस्थित पदके उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है। अवक्तव्य पदके उदीरकोंके अन्तरकालका भंग ओघके समान है । इसी प्रकार सोलह कषाय और सात नोकषायोंके सब पदोंके उदीरकोंका अन्तरकाल जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनके अवक्तव्य पदके उदीरकों का जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है। नपुसकवेदका अवक्तव्य पद नहीं है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके सब पदों के उदीरकों के अन्तरकालका भंग ओघके समान है । इसी प्रकार सब नारकियोंमें जानना चाहिए । इसी प्रकार पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्चत्रिकमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि नपुंसकवेदके अवक्तव्य पदके उदीरकों के अन्तरकाल का भंग ओघके समान है। स्त्रौवेद और पुरुषवेदके सब पदोंके उदीरकों के अन्तरकालका भंग ओघके समान है । इतनी विशेषता है कि पर्याप्तकों में स्त्रीवेद नहीं है और योनिनियों में स्त्रीवेद तथा पुरुषवेद नहीं है। तथा योनिनियों में स्त्रीवेदका अवक्तव्य पद नहीं है। ४१४. पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च अपर्याप्तकों में मिथ्यात्व, सोलह कषाय और सात नोकषायोंके सब पदों के उदीरकों के अन्तरकालका भंग नारकियों के समान है। इतनी विशेषता है कि इनमें मिथ्यात्वका अवक्तव्य पद नहीं है। $ ४१५. मनुष्यत्रिकमें पञ्चेन्द्रिय तिर्यचत्रिकके समान भंग है। इतनी विशेषता है कि मनुष्यिनियों में स्त्रीवेदके अवक्तव्य पदके उदीरकोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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