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________________ ४६ amerk आचार्य श्री सामाशिमीरापहाभियोगहारपरूनणा सम्मा द्विस्स भय-दुगुंगाहिं विणा अपचक्खाणपवेसेण सत्तमो चउवीसभंगपयारो ७ । समेदे सर चेत्र चउवीस भंगा लभंति । एत्थ सब्बभंगसमासो अट्ठसविसदमेतो १६८। ___ सत्तण्हं पयडोएं पवेसगस्स दस चउवोस भंगा। ८७. तं जहा—संजदस्स वेदगसमत्त-चदुसंजलग-तिण्णिवेद-दोजुगल-भयसुंलाओं अस्सिऊण पढमो चउचीसभंगपयारो १ । उवसमसम्माइडिस्स खस्यसम्मापहिस्स वा संजदासंजदस्स पञ्चरखाण-भय-दुगुंकाहिं सह विदियो २ । संजदासजदस्सेव दगसम्मत्तेण भएण च तदियो ३ । भएण विणा दुगुबाए सह चउत्थो ४ । पुणो खीणोवसंतदंसणमोहणीयस्स असंजदसम्माइडिस्म भय-अपञ्चक्खाणेहि सह पंचमो ५ । तस्सेव भएण विणा दुगुंछाए सह छट्टो ६ । तस्सेव अक्खीणोवसंतदसणमोहस्स भय-दुगुंकाहि विणा वेदगसम्मत्तोदएण सत्तमो ७ । सम्मामिच्छाइडिस्स भय-दुगुंबाहि बिगा सम्मामिच्छत्तेण सह अट्ठमो ८ । सासणसम्माइद्विम्मि भय-दुगुंछाहि विणा अणंतागुवंधिपवेसेण एवमो ९ । मिच्छाइद्विस्स अणंताणुयंधि-भय-दुगुंबाहि विणा संजुचपढमावलियाए वट्टमाणस्स दसमो १० । एवं दस चउवीसभंगा सत्तपयडिहाणपवेसगस्स लभंति । एत्थ सबभंगसमासो चालीसुत्तरविसदमेतो २४० । मोहका क्षय किया है ऐसे असंयतसम्यग्दृष्टि जीवके भय और जुगुप्साके विना अप्रत्याख्यानापरणके प्रवेशसे सातवाँ चौबीस भंगोंका प्रकार होता है-७। इसप्रकार ये सात ही चौबीस भंग प्राप्त होते हैं । यहाँ पर सब भंगीका योग एकसौ अरसठमान है.-१६८।। * सात प्रकृतियों के प्रवेशक जीवके दस चौबीस भंग होते हैं। ८. यथा-संग्रत जीवके वेदकसम्यक्त्व, चार संचलन, तीन वेद, दो युगल, भय और जुगुप्साके आश्रयसे पहला चौबीस भंगोंका प्रकार होता है-१। उपशमसम्यग्दृष्टि या सायिकसम्यग्रष्टि संयतासंयत जीवके प्रत्याख्यानावरण, भय और जुगुप्साके साथ दूसरा चौबीस भंगोंका प्रकार होता है-२। संयतासंयत जीवके ही वेदकसम्यक्व और भयके साथ वीसरा चौबीस भंगोंका प्रकार होता है-३। भयके बिना जुगुप्साके साथ चौथा चौबीस भंगोंका प्रकार होता है.४ । पुनः जिसने दर्शनमोहनीयका क्षय या उपशम किया है ऐसे असंयतसम्यम्दृष्टि जीवके भय और अप्रत्याख्यानावरणके साथ पांचवां चौबीस भंगोंका प्रकार होता है । उसीके भयके बिना जुगुप्साके साथ छठा चौबीस भंगोंका प्रकार होता है,६। जिसने दर्शनमोहनीयका क्षय या उपशम नहीं किया है, ऐसे उसी जीवके भय और जुगुप्साके विना वेदकसम्यक्त्य (सम्यक्त्व प्रकृति ) के उदयसे सातवाँ चौबीस भंगोंका प्रकार होता है। सम्यग्मिध्यादृष्टि जीवके भय और जुगुप्साके बिना सम्यग्मिथ्यात्वके साथ पाठवाँ चौबीस भंगोंका प्रकार होता है.८। सासादनसम्यग्दृष्टि जीवके भय और जुगुप्साके बिना अनन्तानुबन्धीका प्रवेश होनेसे नौवाँ चौबीस भंगोंका प्रकार होता है । अनन्तानुबन्धी, भय और जुगुप्साके विना अनन्तानुबन्धीसे संयुक्त प्रथम आवलिमें विद्यमान मिथ्याटि जीवके दसवाँ चौबीस भंगोंका प्रकार होता है। इस प्रकार सात प्रकृतियोंके प्रवेशक जीवके दस चौबीस भंग प्राप्त होते हैं। यहाँ पर सब भंगोंका जोड़ दासौ चालीस २४० होता है ।
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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