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________________ २७८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ वेदगो ७ १६०५. हस्सस्स जह० द्विदिमुदी० मिच्छ० सोलसक०-भय-दुगुंछ० गईसयभंगो। णस० णिय उदी० णिय. अज० संखे०गुणब्भ० । रदि णिय उदी० णिय० जहण्णा । एवं रदीए । एवमरदि-मोगाणं ! ६०६. भय. जह० डिदिउदी० सोलसक० सिया उदी० | जदि० उदी, जहण्णा अजहण्णा था। जहण्णादो अजहण्णा बिट्टाणपदिदा असंखे०भागम० संखे०भागभ० वा । मिच्छ० अरदि-सोग-गस० अणंताणुबंधिभंगो । दुगुबा० सिया उदी० । जदि उदी०, णिय० जहण्णा | एवं दुगुंलाए । एवं पढमाए पुढवीए दछ । ६०७. विदियादि जाय छट्टि चि मिच्छ०-सम्म०-सम्मामि० रिणरयोघभंगो । अणताणुकोध० जह. द्विदिउदी० मिच्छ० णिय उदी. णिय ० अज० असंखे०. गुणब्भ० । तिण्ड कोधाणं णवंसय० णिय ० उदी णिय. अजह. असंखेचभागम्भ। छएणोक० सिया उदी० । जदि उदी०, णिय० अजह. असंख० भागभ । एवं तिण्ई कसायाणं । मार्गदर्शक :- आचार्य श्री सुविधिसागर जी म्हारोज" | एष तिण्ह ६०८. अपचक्खाणकोष० जह० द्विदिउदी. दोण्हं कोधाणं एवंस० णिय० ६६०५. हास्यकी जघन्य स्थितिके उदीरक जीवके मिथ्यात्व, सोलह कपाय, भय और जुगुप्साका भंग नपुसकत्रेदके समान है। नपुसकवेदका नियमसे उदीरक है जो नियमसे संख्यातगुणी अधिक अजवन्य स्थितिका नदीरक है। रतिका नियमसे उदीरक है जो नियमसे. जयन्य स्थितिका उदीरक है। इसी प्रकार रतिकी जघन्य स्थितिकी उदीरणाको मुख्य के. सन्निकर्प जानना चाहिए। इसीप्रकार अरति और शोककी जघन्य स्थितिकी उदीरणाको मुख्य कर सन्निकर्ष जानना चाहिए। १६०६. भयकी जघन्य स्थितिका उदीरक जीव सोलह कपायका कदाचित् उदीरक है। यदि उदारक है. तो जघन्य या अजघन्य स्थितिका उदीरक है। यदि अजघन्य स्थितिका उदीरक है ता जवन्यकी अपेक्षा असरल्यात. भाग अधिक या संख्यातवें भाग अधिक द्विस्थानपतित अजवन्य स्थिति का उदीरक है। मिथ्यात्व, अरति, शोक और नपुसकवेदका भंग अनन्तानुबन्धीक समान है। जुगुप्साका कदाचित उदीरक है। यदि उदीरक है तो नियमसे जघन्य स्थिति का उधारक है । इसीप्रकार जुगुप्साकी जघन्य स्थितिकी उीदरणाको मुख्य कर सन्निकर्ष जानना चाहिए | इसीप्रकार प्रथम पृथिवीमें सन्निकर्ष जानना चाहिए। ६६०७. दूसरोसे लेकर छटी पृथिवी तकके भारकियोम मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका भंग सामान्य नारकियोंके समान है। अनन्तानुबन्धी क्रोधको जघन्य स्थितिका उदीरक जीव मिथ्यात्वका नियमसे उदीरक है जो नियमसे असंख्यातगुणी अधिक अजवन्य स्थितिका उदीरक है। तीन क्रोध और नपुंसकवंदका नियमसं उदीरक है, जो नियमसे प्रसंन्यात भाग अधिक अजघन्य स्थितिका उदीरक है। छह नोकपायांका कदाचित् उदीरक है। यदि उदीरक है ता नियमसं असंख्यानवें भाग अधिक अजघन्य स्थितिका उदारक है। इसीप्रकार तीन कपायोंकी जवन्य स्थिति उदारणाको मुख्य कर सन्निकर्ष जानना चाहिए । ३६०८, अप्रत्याख्यान काधकी जन्य स्थितिका उदीरक जीव दो क्रोध और नपुसकवेद
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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