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________________ गा० ६२ ] उत्तरपयष्टिडिदिउदीरणाए एयजीदेश अंतरं २५६ णाणि, पलिदो ० सादिरे०, पलिदो० सादिरे०, पणवण्णं पलिदो० देखणं । अणुक्क० जह० एयस०, उक्क० आवलिया । उवरि इत्थिवेद० अणुदीरगा । सन्वेसिमरदिसोग० अणुक्क० जह० एयसमओ, उक्क० अंतोमु० | यवरि सहस्सारे अरदि-सोम ० अणुक्क० जह० एयस०, उक्क० इम्मासा | १५५८, आणदादि उपरिमवजा चि सव्वपयडीमुक्क० द्विदिउदीरणा णत्थि अंतरं मिच्छ० सम्म० सम्भाभि० अरांता०४ अणुक्क० जह० अंतोमु०, ० सगहिदी देखणा । बारसक० छण्णोक० अणुक्क० जह० उक्क० अंतोमु० । पुरिसवे० उक्क० अणुक्क० रास्थि अंतरं । अणुद्दिसादि सबट्टा त्ति मम्म० - ७ - पुरिसके० उक्क० अणुक्क० डिदिउदी० गत्थि अंतरं । बारसक० छण्णोक० उक्क० डिदिउदी० यत्थि अंतरं । अणुक० जहण्णुक्क० अंतोमु० । एवं जान० । ५५९. जह० पदं । दुविहो णि० - प्रोघेण आदेसेण य । श्रघेण मिच्छ० जह० द्विदिउदी० जह० पलिदो० असंखे० भागो, उक्क० उवडपोम्गलपरियहं । श्रजह० जह० अंतोमु०, उक० वेळा सागरो० देसुणाणि । एवं सम्मामि० । यवरि अजह० उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल क्रमसे कुछ कम तीन पल्य, साधिक एक पल्य, साधिका और लीवर अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल एक आवति है । श्रागेके देव स्त्रीवेदके अनुदीरक हैं। सबमें अरति और शोककी अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । इतनी विशेषता है कि सहस्रार कल्प में अरति और शोककी अनुत्कृष्ट स्थितिचदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल छह महीना है । $ ५५८. अनतकल्पसे लेकर उपरिम मैवेयऋतकके देवोंमें सच प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका अन्तरकाल नहीं है। मिध्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्दानुबन्धी चतुष्ककी अनुत्कृष्ट स्थिति उदीरणाका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम अपनी-अपनी स्थितिप्रमाण है। बारह कषाय और छह नोकषायकी अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका जघन्ध और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । पुरुषवेदकी उत्कृष्ट और स्थित दोरा का अन्तरकाल नहीं है। अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितक के देवोंमें सम्यक्त्व और पुरुषवेदकी उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका अन्तरकाल नहीं हैं । बारह कषाय और छह नोकषायोंकी उत्कृष्ट स्थितिउदीरण का अन्तरकाल नहीं है । अनुत्कृष्ट स्थितिउदीरणाका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । इसीप्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । ५४६ जघन्य प्रकृत हैं। निर्देश दो प्रकारका है— ओघ और आदेश । प्रोसे मिथ्यात्व की जघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य अन्तरकाल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपाधयुदल परिवर्तनप्रमाण है। अजघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम दो बासठ सागरप्रमाण है । इसीप्रकार सम्यग्मिथ्यात्व के विषय में जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इसकी अजघन्य
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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