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________________ १० मार्गदर्शक :- आचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज जयवलासहिदे कसा पाहुडे । [ वेदगो ७ * एवं पुए सुक्तं पडिवोरणाए ६१५. कुदो | कदिसदस्स भेदगरणणप्पयस्स अरणत्थासंभवादो। एतदुक्तं भवति पथ डिउदीरण्ा दुबिहा— मूलपयडिउदीरणा उत्तरपयडिउदीरणा च । उत्तरपर्याडिउदीरणा दुविधा - एगेगुत्तरपय डिउदीरणा पर्याडिङ्काणउदीरणा चेदि । एत्थ पयडिउदीरणाए पडिवद्धमेदं सुतं णाण्णत्थेति । जइ एवं मूलपय डिउदीरणाए एगेगुत्तरपडिउदीरणाए व एत्थ परूवणा ण जुञ्जदे; गाहासुतेण तासिमसंगहियत्तादो ? ण एस दोसो देसमासणारा तेसिं पि तत्थ संगहियत्तादो । * एवं तावद्ववणीयं । १६. एदं पयड | पुदीरणापडिबद्धं सुत्तपदं ताव इवणीयं । किं कारणं ? एगेगपय डिउदीरणाए अपरूविदाए तप्परूवणासंभवादो ! * एगेगपपडिउदीरणा दुविहा--- एगेगमूल पपडिउदीरणा च एगेगुतरपय डिउदीरणा च । १७. एगेगपय डिउदीरणा ताव मूलुत्तरपयडिभेय मिरगा विहासिन्या चि gi हो । * पदापि वे व पत्तेगं बउवीसमणियो गद्दारेहिं मग्गिऊण । हुआ है। * परन्तु यह सूत्र प्रकृतिस्थानउदीरणामें प्रतिबद्ध है । १५. क्योंकि भेदोंकी गणना करनेवाला 'कति' शब्द अनर्थक नहीं हो सकता । तात्पर्य यह है - प्रकृति उदीरणा दो प्रकारकी है - मूल प्रकृति उदीरणा और उत्तर प्रकृति उदीरणा | उत्तर प्रकृति उदीरणा दो प्रकारकी है- एकैकप्रकृतिउदीरणा और प्रकृतिस्थानउदीरणा | इनमेंसे यहाँ पर प्रकृतिस्थानउदीरणा में यह सूत्र प्रतिबद्ध है, अन्यत्र नहीं । शंका- यदि ऐसा है तो मूलप्रकृतिउदीरणा और एकैकप्रकृतिउदीरणा इनकी प्ररूपणा यहाँ पर नहीं बनती, क्योंकि गाथा सूत्र द्वारा उनका संग्रह नहीं किया गया है। समाधान-- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि देशामर्षक न्यायसे उनका भी उसमें संग्रह * परन्तु इसे स्थगित करना चाहिए । ६ १६. प्रकृतिस्थान उदीरणासे सम्बन्ध रखनेवाले इस सूत्र पदको स्थगित करना चाहिए, क्योंकि एकै प्रकृतिउदीरणा की प्ररूपणा किये बिना उसकी प्ररूपणा नहीं हो सकती । * एकै प्रकृतिउदीरणा दो प्रकारकी है— एकैकमूलप्रकृतिउदीरणा और एकैक उत्तरप्रकृतिउदीरणा | १७. मूलप्रकृतियों और उत्तरप्रकृतियोंके भेदसे भेदको प्राप्त हुई एकै प्रकृतिउदीरणा सर्वं प्रक्षम व्याख्यान करने योग्य है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * इन दोनों ही प्रकारकी उदीरणाओं को पृथक् पृथक् चौबीस अनुयोगद्वारों केआपसे अनुमार्गण करके
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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