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________________ जयबलासहिते कसायपाहुडे जहण्णुक० कृता किर्शक :एसचीमा तिरियम अपज० देवा भवण०वणवंतगति । विदियादि डिचि मोह० जह० जह० डिदि ० उदीर० णत्थि अंतरं । एवं जोदिसियादि जाव सव्वड्डा नि । सतमाए मोह० जह० द्विदिउदी ० व्यस्थि अंतरं । जह० जह० एयसमओ, उक्क० अंतोमु० । तिरिक्खेसु मोह० जह०डिदिउदीर० जह० अंतोमु०, उक्क० प्रसंखेआं लोगर । अज० जह० एयस०, उक्क० अंतोमु० | मणुसतिए मोह० जह० डिदि ० उदी० जह० अंतोमुहतं, उक० पुन्यकोडिपुध० | अज० जह० एस० उ० अंतोमु० । एवं जाव० । २०० [ वेदगो ७ " Q ६ ४४१. णाणाजीवभंगविचयाणुगमं दुबिहं- जह० उक० | उकस्से पपदं । दुविदो णि०. - श्रयेण आदेसे । योघेण उदीर गेसु पय० । श्रणुदीरगेसु अन्हारो । एदेण देण उकस्सियाए द्विदीए सब्वे अणुदीरगा, सिया अणुदीरगा च उदीरगो च, सिया अणुदीरगा च उदीरगा च । अणुकस्स द्विदीए सिया सच्चे उदीरगा, सिया उदीरगा च अणुदीरगो च, सिया उदीरगा च अणुदीरंगा च एवं चदसु गदीसु । | अजघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल एक समय है । इसीप्रकार प्रथम पृथिवी, सच पञ्चं न्द्रिय तिर्यञ्च, मनुष्य अपर्याप्त सामान्य देव, भवनवासी और व्यन्तर देवों में जानना चाहिए। दूसरी पृथिवी से लेकर छटी पृथिवी टकके नारकियोंमें मोहनीयकी अघन्य और अजन्य स्थितिउदीरणाका अन्तरकाल नहीं है। इसीप्रकार ज्योतिषियोंसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तक के देवामें जानना चाहिए। सातवीं पृथिवी में मोहनीयकी जघन्य स्थितिउदीरणाका अन्तरकाल नहीं है। अजघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है । तिर्यों में मोहनीयकी जघन्य स्थितिउदीरणाका अन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त हैं और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोक नमारण है । श्रजघन्य स्थितिउदीरणाका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कट अन्तर अन्तमुहूर्त है। मनुष्यत्रिक में मोहनीयको जघन्य स्थितिउदीरणाका जयन्य अन्तर अन्नमुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वप्रमाण है । अजघन्य स्थितिउदीरणाका अन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर तमुहूर्त है। इसीप्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । विशेषार्थ – यहां प्रतिपादित सभी मार्गणाओं में स्वामित्वको जानकर अन्तरकाल घटित कर लेना चाहिए । सुगम होनेसे विशेष स्पष्टीकरण नहीं किया । १४४१. नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचयानुगम दो प्रकारका है - जघन्य और उत्कृष्ट । उत्कृष्टका प्रकरण हैं। निर्देश दो प्रकारका है— ओघ और आदेश । श्रघसे उदीरकों का प्रकरण है, अनुदीरक व्यवहार योग्य नहीं हैं। इस अर्थपदके अनुसार उत्कृष्ट स्थिति कदाचित् सब अनुदीरक हैं, कदाचित् नाना जीव अनुदीरक हैं और एक जीव उदीरक है, कदाचित् नाना जीव अनुदीरक हैं और नाना जीव उदीरक हैं। अनुत्कृष्ट स्थिति के काचित् सब जीव उदीरक हैं, कदाचित् नाना जीव उदीरक हैं और एक जीव अनुदारक है, कदाचित् नाना जीव उदीरक हैं और नाना जीव अनुदारक हैं। इसीप्रकार चारों गतियोंमें जानना चाहिए। इतनी विशेषता है
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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