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________________ गा० ६२ ] उत्तरपडिउदीरणाए ठाणा से साणियोगदारपण १७१ ३७३. णाणाजीवेहिं भंगविचयाणुगमेण दुविहो णिद्देसो- ओषेण आदेसेण य । श्रोषेण अव०ि सव्त्रजीव० णिय० श्रत्थि सेसपदा भयणिज्जा । एवं चदुसु गदी | गावरि पंचि०तिक्खिपज्ज० अवडि णिय अस्थि, सिया एदे च अप० अप०- - अडिο ष्यदरवित्तया च मणुसअप विहत्तिओ च, सिया एदे च भय णिज्जा । एवं जाय ० I ६ ३७४ भागाभागाणु० दुविहो खि० - ओषेण श्रादेसेण य । ओमंग अवडि० सब्जी० के० १ श्रता भागा | सेसमांत भागो । एवं तिरिक्खा० । आदेसेण रइय० श्रवडि सब्वजी० श्रसंखेज्जा भागा। सेममसंखे० भागो । एवं सव्त्रणिरय ०-- सत्रपचिदिवतिरिक्त मर्यादेन महाप्रचराजिदा ति । मणुमपज्ज०मसरणी०० - मव्व० अट्टि० संखेज्जा भागा। सेस संखे० भागों । एवं जाव० ० ९३७५. परिमाणाणु ० दुविहो णिः - श्रघेण श्रादेसे० । श्रघेण भुज०. अप० उपशान्तकषायसे मरकर प्रथम समयमें ६ का प्रवेशक और दूसरे समय में २१ का प्रवेशक होकर भुजगार हो गया अतः अन्तर्मुहूर्त पश्चात् उसने वेदकसम्यक्त्व प्राप्त करते समय प्रथम समय में २२ प्रकृतिक प्रवेशस्थान और दूसरे समय में २४ प्रकृतिक प्रवेशस्थान प्राप्त किया। इस प्रकार इन देवों में भुजगारप्रवेशकका जघन्य और उत्कृष्ट श्रन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होनेसे वह तत्प्रमाण कहा हूँ | पतरका अन्तर नहीं है, क्योंकि वहाँ पर या तो २२ से २१ वालेके या २८ से २४ वाले के एक बार अल्पतर होता है। पहले इनमें भुजगार प्रवेशकका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल दो समय बतला आये हैं, इसलिए उसे ध्यान में रख कर यहाँ पर अवस्थित प्रवेशका जघन्य अन्दर एक समय और उत्कृट अन्तर दो समय कहा है । शेष कथन सुगम है । १३०३, नाना जीवों की अपेक्षा भंगविचयानुगमसे निर्देश दो प्रकारका है-आंघ और आदेश | आपसे अवस्थित प्रवेशक सब जीव नियमसे हैं। शेष पद भजनीय हैं। इसप्रकार चारों गतियों में जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि पञ्चेन्द्रिय तिर्यच्व अपर्याप्त जीवों में अवस्थितप्रवेशक जीव नियमसे हैं। कदाचित् ये हैं और एक अल्पत र प्रवेशक जीव है । कदाचित् ये हैं और नाना अल्पतरप्रवेशक जीव हैं। मनुष्य अपर्याप्तकों में अल्पतर और अवस्थित प्रवेशक जीव भजनीय हैं। इसी प्रकार अनाहारक मार्गेरणा तक जानना चाहिए। ६ ३७४. भागाभागानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-थोघ और आदेश । ओघ अवस्थितप्रवेशक जीव सब जीवोंके कितने भागप्रमाण हैं। अनन्त बहुभागप्रमाण हैं। शेष पत्रोंके प्रवेशक जीब अनन्तयें भागप्रमाए हैं। इसीप्रकार तिर्यचामें जानना चाहिए । आदेश से नारकियों में अवस्थित प्रवेशक जीव सब जीवोंके असंख्यात बहुतभागप्रमाण हैं। शेष पदों के प्रवेशक जीव असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। इसी प्रकार सब नारकी, सब पचेन्द्रिय सिर्यन, सामान्य मनुष्य, मनुष्य अपयाप्त, सामान्य देव और अपराजित विमान तक देवीमें जानना चाहिए। मनुष्य पर्याप्त, मनुष्यिनी और सर्वार्थसिद्धि देवों में अवस्थितप्रवेशक जीव सब जीवोंके संख्यात बहुभागप्रमाण हैं। शेष पदों के प्रवेशक जीव संख्यातवें भागप्रमाण हैं । इसीप्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । ६ ३७५ परिमाणानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-आं और आदेश | आंघस
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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