SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 182
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गा० ६२] उत्तरपयडिउदोरगाए ठाणाणं सेसारिणयोगदापावणा १६९ ३७१. प्रादेसेण णेरड्य० भुज-अप्प० जहः एयस० अंतोमु०, उक्क० तेत्तीसं सागरो० देसूणाणि 1 अबहि० जह० एयर०, उक्क • चत्तारि समया । एवं सचणेरइय० । णयरि सद्विदी देसूणा । तिरिक्खेसु भुज०-अप्प० ओघं । अवट्टि. णारयभंगो। एवं पचितिरिक्खतिए | णवरि सगढिदी देसूरणा । पंचितिरि०अपज०-मणुसअपज्ज० अप्प० णस्थि अंतरं । अवढि० जहएणु० पयस० । मणुसतिए पंचिं निरिक्खभंगो । णवरि अववि० जह० एयम०, उक्क० अंतोमु० । अवत्त० जह० अतोमुख, उक्क. पुष्यकोडिपुधः । गतियों में अल्पतर पदके जघन्य अन्तरका प्रकार बतलानेके लिए हमने प्रथम उदाहरण लिपिपद्ध किया है। अथवा अल्पतर पदका जघन्य अन्तर एक समय जो टीकामें कहा है वह जो उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करनेके दो समय पूर्व सम्यक्त्वकी उद्वेलना कर लेता है उसकी अपेक्षा प्राप्त होता हेमार्गदर्भकोनों पदोकार्यप्रवेशिकावधिलाष्ट सास्वार्ध पुद्गलपरिवर्तनप्रमाणा है यह स्पष्ट ही है। जो अबस्थितप्रवेशक जीव एक समय तक भुजगार या अल्पतरप्रवेशक हो एक समयके अन्तरसे पुनः अवस्थितप्रवेशक हो जाता है उसके अवस्थितप्रवेशकका जघन्य अन्तर एक समय प्राप्त होता है। तथा जो एक प्रकृतिक प्रवेशक सर्वोपशामना करके अन्तर्मुहर्त तक अप्रवेशक बना रहता है। पुनः उपशमश्रेणिसे उतरते हुए प्रथम समयमें अवरुव्यप्रवेशक हो और दूसरे समयमें भुजगार प्रवेशक हो अवस्थितप्रवेशक हो जाता है उसके अवस्थितप्रवेशकका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहर्त प्राप्त होता है। प्रान्तर्मुहूर्तके अन्तरसे दो बार उपशमश्रेगि पर चढ़ानेसे प्रवक्तव्य प्रवेशकका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होता है और में उपार्धपुद्गलपरिवर्तनके अन्तरसे चढ़ाने पर उत्कृष्ट छन्तर उपार्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण प्राप्त होता है। यह श्रोधको अपेक्षा सब पदोंके अन्तरकालका खुलासा है। आदेशसे अपनी अपनी विशेषताको समझ कर इसे घटित करना चाहिए। जो विशेष वक्तव्य होगा मात्र उतनेका निर्देश करेंगे। ३७१, आदेशसे नारकियों में भुजगार अल्पतरप्रवेशकोंका जघन्य अन्तर एक समय और अन्तर्मुहर्त है और दोनोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है। अवस्थितप्रवे. शकका जघन्य अन्तर एक समय है और सुत्कृष्ट अन्तर चार समय है। इसी प्रकार सत्र नारकियोंमें जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि कुछ कम अपनी अपनी स्थितिप्रमाण है। नियमों में भुजगार और अल्पतरप्रवेशकका अन्तरकाल भोधके समान है। अवस्थित प्रवेशकका अन्तरकाल नारकियोंके समान है। इसी प्रकार पश्चेन्द्रिय तियश्चत्रिक में जानना राहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि कुछ कम अपनी-अपनी स्थिति कहनी चाहिए । पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्त और मनुष्य अपर्यापकोंमें अल्पतरप्रबंशकका अन्तरकाल नहीं है। अवस्थितप्रवेशकका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर एक समय है। मनुष्यत्रिकमें पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चोंके समान भंग है। किन्तु इतनी विशेषता है कि अवस्थितप्रवेशकका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवक्तव्यप्रवेशकका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त है और उत्कृष्ट श्रन्तर पूर्वकोटि पृथक्त्वप्रमाण है। विशेषार्थ--नारकियों में अवस्थितप्रवेशकका उत्कृष्ट काल तेतीस सागर चतला आये हैं, इसलिए यहाँ भुजगार और अल्पतरप्रवेशकका उक्त कालप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर बन जाता है। तथा इनमें पहले भुजगारप्रवेशकका उत्कृष्ट काल घार समय बतला आये हैं, इसलिए २२
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy