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________________ जयधबलास हिदे कसाय पालुडे [ बेदगो ७ - ३७० अंतरासु दुविहो णि० श्रोषेण आदेसेण य । श्रोषेण भुज० अध्प ० जह० एस० अंतोमु०, अधवा अप्पदरस्स वि एगसमयो । एसो अत्थो उचरि वि जहासंभवं जोजेपव्वो । उक्क उड्डयोग्गल परियट्टा । अबडि० जह० एस० उक्क० अंतोसु०, प्रवत्त० जह० अंतोमु०, उक्क० 2 उबड्ढपो० परियङ्कं । मार्ग १६८ माहियों जितना उसका कायस्थिति या भवस्थितिकी उतने काल तक उसे २६ प्रकृतियोंका प्रवेशक बनाये रखनेसे उस गतिमें अस्थिप्रवेशका उत्कृष्ट फाल भा जाता है। मात्र पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्तकों में २८, २७, और ६ इनमेंसे किसी भी पदकी अपेक्षा अवस्थित प्रवेशकका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त प्राप्त किया जा सकता है। कारण स्पष्ट है। तथा नौ धनुविशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तक के देवों में २८, २४ और २१ प्रकृतियोंके प्रवेशककी अपेक्षा अपनी अपनी स्थितिप्रमाण अवस्थित प्रवेशकका उत्कृष्ट काल प्राप्त करना चाहिए। इन पदोंकी अपेक्षा अवस्थित प्रवेशकका उत्कृष्ट काल सौधर्मादिकल्पोंमें भी प्राप्त किया जा सकता है इतना यहाँ विशेष समझना चाहिए । शेष कथन सुगम है। किन्तु इस सम्बन्ध में कुछ विशेष वक्तव्य है । जो इस प्रकार है- पञ्चेन्द्रिय तिर्यच अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्त को जो जीव अपनी पर्यायके उपान्त्य समयमे उद्वेलना कर २७ या २६ प्रकृतियोंका प्रवेशक होता है मात्र उसी अवस्थित पदका जघन्य काल एक समय कहना चाहिए। इसी प्रकार जो अनुदिशादिकका उपशम सम्यग्दृष्टि देव वेदक सम्यक्त्वको प्राप्त हो प्रथम समय में २१ से २२ प्रकृतियों का प्रवेशक होता है और दूसरे समय में २४ प्रवेशस्थानको प्राप्त करता है उसके भुजगारप्रवेशकका उत्कृष्ट काल दो समय कहना चाहिए। इनमें अवस्थित पदका जघन्य काल एक समय स्पष्ट ही है जो उपशमश्रेणिसे मर कर देव होने पर प्राप्त होता है । बैंक : विशेष उत्कृष्ट का ३७० अन्तरानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है— श्रोथ और मादेश । श्रघसे भुजगार और अल्पतरप्रधेशकका जघन्य अन्तर एक समय और अन्तर्मुहूर्त है । अथवा अल्पतरप्रवेश का भी जघन्य अन्तर एक समय है। इस अर्धकी आगे भी यथासम्भव योजना करनी चाहिए | तथा उत्कृष्ट अन्तर उपार्थ पुद्गल परिवर्तनप्रमाण है । अवस्थित प्रवेशकका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अवन्यप्रवेशकका जधन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर उपार्थ पुद्गल परिवर्तनप्रमाण है । विशेषार्थ - अनन्तानुबन्धीका वियोजक कई उपशम सम्यग्दृष्टि जीव उपशम सम्यक्त्वके काल में तीन समय शेष रहने पर सासादनभावको प्राप्त हो २२ प्रकृतियों का प्रवेशक हुआ। तथा दूसरे समय में शेष अनन्तानुबन्धत्रिक के उदद्यावलि में प्रवेश करने पर २५ प्रकृ तियोंका प्रवेशक हुआ। इसके बाद वह तीसरे समय में पच्चीस प्रकृतियोंका ही प्रवेशक बन रक्षा और तदन्वर समयमें मिध्यात्व में जाकर वह २६ प्रकृतियोंका प्रवेशक हो गया। इस प्रकार भुजगार प्रवेशकका जघन्य अन्तर एक समय प्राप्त हुआ। कोई छब्बीस प्रकृतियों का प्रवेशक मिध्यादृष्टि जोष उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त कर पच्चीस प्रकृतियोंका प्रवेशक हुआ, उसके बाद वह अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी बिसंयोजना कर इक्कीस प्रकृतियोंका प्रवेशक हो गया इस प्रकार अल्पतर प्रवेशकका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त हुआ। अल्पतर प्रवेशकका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त उपशमणि और क्षपणामें भी प्राप्त किया जा सकता है सो जान कर घटित कर लेना चाहिए। घोष प्ररूपणा में यद्यपि इसकी मुख्यता है। फिर भी चारों 17
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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