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________________ गा०६२] उत्तरपयडिउदीरणाए ठाणाणं सेसाणियोगद्दारपरूवणा १६५ तिए । श्रादेसेण णेरड्य० अस्थि भुज०--अप्प०--अद्वि०प० । एवं सम्बणेरइय० तिरिक्ख०-पंचिंदियतिरिक्खतिय३--सव्वदेवा सि | पंचिं०निरि०अपज ०-मणुसअपज्ज० अस्थि अप्प-अवहि०पवे० । एवं जाव० | १३६७. सामित्ताणु० दुविहो णि०-अोघेण प्रादेसे० । श्रोघेण भुज०अप्प०--अववि पवेसगो को होदि ? अण्ण. सम्मादि० मिच्छाइट्टी वा । अवत्त.. पवेसगो को होदि ? अण्ण० मणुसो वा मणुसिणी वा उचसामगो परिवदमाणगो देवो वा पढमसमयपवेसमो । एवं मणमतिए । णरि पढमसमयदेवो त्ति ण भाणियन्वं । एवं सधणेरइय०-सव्यतिरिक्ख-सचदेवा ति। णवरि श्रवत्त० णस्थि । वरि पंचिं०तिरिक्सअपक्ष --मणुसअपञ्ज. अप-अपट्टि • कस्स ? अण्णद० । अणुद्दिसादि सबट्ठा ति भुज-अप्प०-अवढि० कस्स ? अण्णदः । एवं जाव० येविकालाबादुपिहोतुमिछात्रोवणीआईसेन। श्रोघेण भुज० जह० एयस०, उक० चत्तारि समया। तं कथं ? अणंताणुबंधी विसंजोएदण द्विदउयसमसम्माइट्ठी उत्रसमसम्मत्तद्धाए वे समया अस्थि ति सासणभावं पडिक्ण्णो तस्स पढमसमए बावीसइसी प्रकार मनुष्यत्रिकमें जानना चाहिए। आदेशसे नारकियोंमें भुजगार, अल्पतर और अवस्थित प्रवेशक जीव हैं। इसी प्रकार सब नारकी, सामान्य तियरूच, पन्चेन्द्रिय तिर्यकचत्रिक और सब देवोंमें जानना चाहिए। पञ्चेन्द्रिय तिर्यच अपर्याष्ट और मनुष्य अपर्याप्त जीवोंमें अल्पतर और अवस्थित प्रवेशक जीव हैं। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए। ३६७. स्वामित्वानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और श्रादेश । ओघसे भुजगार, अल्पतर और अवस्थित प्रवेशक कौन होता है ? अन्यतर सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि होना है। प्रवक्तव्य प्रवेशक कौन होता है ? उपशमश्रेणिसे गिरनेवाला मनुष्य या मनुष्यनी अथवा प्रथम समयमें प्रवेश करनेवाला देव होता है। मनुष्यत्रिकमें इसीप्रकार जानना चाहिए । किन्तु इननी विशेपता है कि 'प्रथम समयमें प्रवेश करनेवाला देव' ऐसा नहीं कहना चाहिए। इसीप्रकार सब नारकी, सब तिर्यञ्च और सब देबोंमें जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता हूँ कि इनमें अवक्तव्यप्रवेशक नहीं है। तथा इतनी और विशेषता है कि पञ्चेन्द्रिय तिर्यच अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्तकों में अल्पतर और अवस्थित पद किसके होता है ? अन्यतरके होता है। अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवामें भुजगार, अल्पतर और अवस्थितपद किसके होते हैं ? अन्यतरके होते हैं ? इसीप्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए। ६३६८. कालानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है.--श्रोध और आदेश । श्रोषसे ( भुजगार प्रवेशकका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल चार समय है। शंका-वह कैसे ? समाधान–अनन्तानुवन्धीचतुम्की विसंयोजना करनेवाला उपशमसम्यादष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वके काल में दो समय शेष रहने पर सासादनभावको प्राप्त हुआ। उसके प्रथम समयमें वाईस प्रकृतिकस्थान होकर एक भुजगार समय प्राप्त हुआ। उसी जीवके टूपरे
SR No.090222
Book TitleKasaypahudam Part 10
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherMantri Sahitya Vibhag Mathura
Publication Year1967
Total Pages407
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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