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________________ गा० ५८ ] उत्तरपयडिअणुभागसंक मे श्रणुत्तणियोगद्वारसूयणा ७१ ९ २२३. एदेसि कम्माणं जहण्णाणभागस्स संकामया असंकामया च णियमा अत्थि त्ति वृत्तं होइ । कुदो एवं सुहुमेइ दियहदसमुप्पत्तियकम्मेण लद्धजहण्णभावाणमेदेसिं तदविरोहादो | * सेसाणं कम्माणं जहण्णाणुभागस्स सव्वे जीवा सिया असंका मया । ९ २२४. कुदो ? दंसण-चरित्तमोहक्खवयाणमर्णतारणुबंधिसंजोजयाणं च सव्त्रद्धभादो । * सिया संकामया च संकामत्र च । ९ २२५. कुदो ? असंकामयाणं धुवभावेण कदाइमेय वस्स जहण्णभावपरिणदस्स परिष्फुडमुवलंभादो ? * सिया संकामया च संकामया च । $ २२६. कुदो ? असंकामयाणं धुवभावेण केत्तियाणं पि जीवाणं जहण्णाणु भागसंकामयभावपरिणदाणमुवलंभादो । एवमोघो समत्तो । आदेसेण सव्वं विहत्तिभंगो । एवं भंगविचओ समत्तो । २२७. एत्थे सूचिदभागाभाग - परिमाण खेत्त - फोसणाणं पि विहत्तिभंगो । ६ २२३. इन कर्मों के जघन्य अनुभाग के संक्रामक और असंक्रामक नाना जीव नियमसे हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । शंका- ऐसा क्यों है ? समाधान—क्योंकि एकेन्द्रियसम्बन्धी हतसमुत्पत्तिक कर्मके साथ जघन्यपनेको प्राप्त हुए इन जीवोंमें जघन्य अनुभाग के संक्रामक और असंक्रामक नाना जीवोंके सद्भाव माननेमें कोई विरोध नहीं आता । * शेष कर्मों के जघन्य अनुभागके कदाचित् सब जीव असंक्रामक होते हैं । § २२४. क्योंकि दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयकी क्षपणा करनेवाले और अनन्तानुबन्धी विसंयोजना करनेवाले जीव सर्वदा नहीं पाये जाते । * कदाअित नाना जीव असंक्रामक होते हैं और एक जीव संक्रामक होता है । २२५. क्योंकि जघन्य अनुभाग के असंक्रामक ये नाना जीव ध्रुवरूपसे और कदाचित् जघन्य अनुभागके संक्रामकरूपसे परिणत हुआ एक जीव स्पष्टरूपसे पाया जाता है । * कदाचित् नाना जीव असंक्रामक होते हैं और नाना जीव संक्रामक होते हैं । § २२६. क्योंकि जवन्य अनुभाग के संक्रामक ये नाना जीव ध्रुवरूपसे और जघन्य अनुभागके संक्रामकभावसे परिणत हुए कितने ही जीव पाये जाते हैं। इस प्रकार श्रोघ कथन समाप्त हुआ । देशकी अपेक्षा सब कथन अनुभागविभक्तिके समान है । इस प्रकार भङ्गविचय समाप्त हुआ । § २२७. यहाँ पर इस पूर्वोक्त कथन के द्वारा सूचित हुए भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र और स्पर्शनको अनुभागविभक्तिके समान जानना चाहिए ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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