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________________ ६८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ सम्म० सिया अस्थि । जदि अस्थि, सिया संका० । जदि संका० तं तु जहण्णादो अज० अणंतगुणब्भ० । एवं जाव० । *णाणाजीवेहि भंगविचओ दुविहो–उक्कस्सपदभंगविचओ जहएणपदभंगविचओ च । ६२१३. सुगममेदं णाणाजीवभंगविचयस्स जहण्णकस्साणुभागसंकामयविसयत्तेण दुविहत्तपदुप्पाइयं सुत्तं। संपहि दोण्हमेदेसिं भंगविचयाणमट्ठपदपरूवणं काऊण तदो उवरिमा परूवणा कायना ति जाणावणमुत्तरसुत्तमाह तेसिमट्ठपदं काऊण। ६२१४. तेसिमणंतरणिदिवाणमुक्कस्स-जहण्णपदभंगविचयाणमट्ठपदं काऊण पच्छा तदोघादेसपरूवणा कायव्वा ति सुत्तत्थसंबंधो । किं तमट्ठपदं १ वुच्चदे–जे उकस्साणुभागसंकामया ते अणुक्कस्साणुभागस्स असंकामया । जे अणुकस्साणुभागसंकामया ते उकस्साणुभागस्स असंकम्मया । जेसि संतकम्ममत्थि तेसु पयदं, अकम्मेहि अव्ववहारो। एवं जहण्णाजहण्णाणं पि वत्तव्वं । एवमट्ठपदपरूवणं काऊणुकस्तपदभंगविचयस्स ताव णिदेसो कीरदे । तं जहा है कि अप्रत्याख्यान क्रोधके जघन्य अनुभागके संक्रामक जीवके सम्यक्त्वसत्कर्म कदाचित् है । यदि है तो वह कदाचित् संक्रामक है। यदि संक्रामक है तो वह जघन्य अनुभागक्रा भी संक्रामक होता है और अजघन्य अनुभागका भी संक्रामक होता है। यदि अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है तो जघन्यसे अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणातक जानना चाहिए। * नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय दो प्रकारका है-उत्कृष्टपदभङ्गविचय और जघन्यपदभङ्गविचय । ६२१३. नाना जीवविषयक भङ्गविचयके जवन्य और उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकोंके विषयरूपसे दो भेदोंका कथन करनेवाला यह सूत्र सुगम है । अब इन दोनों भङ्गविचयोंके अर्थपदका कथन करके उसके बाद आगेकी प्ररूपणा करनी चाहिए इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * उनका अर्थपद करके प्ररूपणा करनी चाहिए। हु २१४. अनन्तर पूर्व कहे गये उत्कृष्टपदभङ्गविचय और जघन्यपदभङ्गविचयका अर्थपद करके अनन्तर उनकी श्रोधप्ररूपण और आदेशप्ररूपणा करनी चाहिए इस प्रकार उक्त सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्ध है । वह अर्थपद क्या है ? कहते हैं जो उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक होते हैं वे अनुकृष्ट अनुभागके असंक्रामक होते हैं। जो अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक होते हैं वे उत्कृष्ट अनुभागके असंक्रामक होते हैं। जिनके सत्कर्म है उनका प्रकरण है, क्योंकि कर्मरहित जीवोंसे प्रयोजन नहीं है । इसी प्रकार जघन्य और अजवन्यकी अपेक्षा भी कथन करना चाहिए। इस प्रकार अर्थपदका कथन करके उत्कृष्टपदभङ्गविचयका सर्वप्रथम निर्देश करते हैं
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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