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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ बारसक०–णवणोक० णियमा अज० अर्णतगुणब्भ० । तिण्हं कसायाणं जह• अज० वा, जहणणदो अज० छट्ठाणपदिदा । एवं तिण्हं कसायाणं । ६२०६. कोहसंज० जह० अणुसंका० तिण्हं संज० णिय० अज० अणंतगुणब्भ० । सेसं णत्थि । माणसंज० जह० अणु०संका० दोण्हं संज० णिय० अज० अणंतगुणब्भ० । सेसं णत्थि । मायासंज० जह० अणु०संका० लोभसंज० णियमा अज० अर्णतगुणब्भ० । सेसं णस्थि । लोहसंज० जह० अणुभागसंका० सेसाणमकम्मंसिगो। ६२१० णवंस जह० अणुभा० संका० सत्तणोक०-चदुसंज० णिय० अज० अणंतगुण० । इत्थिवेद० णिय० जह० । सेसं णत्थि । इथिवे० जह० अणु० संका० सत्तणोक०-चदुसंज० णिय० अज० अर्णतगुणब्भ० । णवंस० सिया अस्थि । जदि अस्थि णिय० जहणं । सेसं णत्थि । हस्स जह० अणु०संका० पंचणोक० णिय० जह । पुरिसवेद-चदुसंज० णिय० अज० अणंतगुणब्भहियं । सेसं णस्थि । एवं पंचणोक० । पुरिसवे. जह० अणुभागसंका० चदुसंज० णिय० अज० अणंतगुणब्भ० । रहित है। अनन्तानुबन्धीक्रोधके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव तीन दर्शनमोहनीय, बारह कषाय और नौ नोकषायोंके अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका नियमसे संक्रामक होता है। अनन्तानुवन्धी मान अदि तीनके जघन्य अनुभागका भी संक्रामक होता है और अजघन्य अनुभागका भी संक्रामक होता है। यदि अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है तो जघन्यकी अपेक्षा छह स्थानपतित अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी मान आदि तीन कषायोंके जघन्य अनुभागको मुख्य कर सन्निकर्ष कहना चाहिए। ६ २०६. क्रोधसंज्वलनके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव शेष तीन संज्वलनोंके अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका नियमसे संक्रामक होता है। वह शेष प्रकृतियोंके सत्कर्मसे रहित है। मानसंज्वलनके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव माया आदि दो संज्वलनोंके अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका नियमसे संक्रामक होता है। वह शेष प्रकृतियोंके सत्कर्मसे रहित है । मायासंज्वलनके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव लोभसंज्वलनके अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका नियमसे संक्रामक होता है । वह शेष प्रकृतियोंके सत्कर्मसे रहित है । लोभसंज्वलनके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव शेष प्रकृतियोंके सत्कर्मसे रहित है। ६२१०. नपुंसकवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव सात नोकषायों और चार संजलनोंके अनन्तगणे अधिक अजघन्य अनभागका नियमसे संक्रामक होता है। स्त्रीवेदके जवन्य अनुभागका नियमसे संक्रामक होता है। वह शेष प्रकृतियों के सत्कर्मसे रहित है ।स्त्रीवेदके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव सात नोकषायों और चार संज्वलनोंके अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका निममसे संक्रामक होता है । नपुंसकवेद कदाचित् है । यदि है तो नियमसे उसके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है । वह शेष प्रकृतियोंके सत्कर्मसे रहित है । हास्य प्रकृतिके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव नियमसे पाँच नोकषायोंके जघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। पुरुषवेद और चार संज्वलनोंके अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका नियमसे संक्रामक होता है। वह शेष प्रकृतियोंके सत्कर्मसे रहित है। इसी प्रकार शेष पाँच नोकषायोंके जघन्य अनुभागसंक्रमको मुख्य कर सन्निकर्ष कहना । पुरुषवेदके जघन्य अनभागका संक्रामक जीव नियमसे चार संज्वलनोंके अनन्तगुणे अधिक अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है। वह शेष प्रकृतियोंके सत्कर्मसे रहित है। इसी
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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