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________________ गा० ५८ ] उत्तरपयडिप्रणुभागसँकमे सणयासो ६१ affar for । दि अस्थि सिया संका ० । जदि संका ० तं तु उक्कस्सादो अणुकरस मतगुणहीणं । एवं जाव० । * जहपण सरिणयासो । $ १६३. एत्तो जहण्गसण्णियासो कायव्यो त्ति भणिदं होइ । संपहि पयडि - परिवाडीए तणिदेसकरणट्ठमुत्तरो सुत्तपबंधो— * मिच्छत्तस्त जहण्ण शुभागं संकामेंतो सम्मत्त - सम्मामिच्छत्ताणं जड़ संकामओ णियमा अजहरणाणुभागं संकामेदि । १६४. कुदो ? मिच्छत्तजहण्णाणुभागसंकामयसु हुमेइ दियहदसमुप्पत्तियसंतकम्मियम्मिसम्मत्त - सम्मामिच्छत्ताणमुकस्सारणुभागसंकमस्सेव संभवदंसणा दो । * जहण्णादो अजहरण मांतगुणग्भहियं । १५. जहण्णादो अर्णतगुणन्भ हियमेवाजहण्णाणुभागं संकामेदि, सम्म-सम्मामिच्छत्ताणमुकस्सारणुभागस्स तत्थ वि विणट्टसरूवेण संकतिसादो । * कम्माणं जहणं वा अजहणणं वा संकामेदि । अनुत्कृष्ट अनुभागका संक्रामक होता है । अनन्तानुबन्धीचतुष्क कदाचित् हैं और कदाचित् नही हैं। यदि हैं तो उनका कदाचित् संक्रामक होता है और कदाचित् संक्रामक नहीं होता । यदि संक्रामक होता है तो उत्कृष्ट अनुभागका भी संक्रामक होता है और अनुत्कृष्ट अनुभागका भी संक्रामक होता है । यदि अनुत्कृष्ट अनुभागका संक्रामक होता है तो अपने उत्कृष्टकी अपेक्षा अनन्तगुणे हीन अनुत्कृष्ट अनुभागका संक्रामक होता है। इसी प्रकार अनाहारकमार्गणा तक जानना चाहिए । * अब जघन्य अनुभागसंक्रमके सन्निकर्षका कथन करते हैं । $ १६३. आगे जघन्य अनुभागसंक्रम करना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब प्रकृतियोंकी परिपाटीके अनुसार उसका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्रप्रबन्ध है * मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागका संक्रामक जीव सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका यदि संक्रामक होता है तो नियमसे अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है । १४. क्योंकि मिध्यात्वके सूक्ष्म एकेन्द्रियसम्बन्धी हतसमुत्पत्तिक सत्कर्मरूप जघन्य अनुभाग संक्रामक जीवके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागका संक्रम ही सम्भव देखा जाता है । * जो जघन्यकी अपेक्षा अनन्तगुणे अजघन्य अनुभागका संक्रामक होता है । १५. जबकी अपेक्षा अनन्तगुणे अधिक अजधन्य अनुभागका ही संक्रम करता है, क्योंकि वहाँ पर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व के उत्कृष्ट अनुभागका अविनरूपसे संक्रम देखा जाता है। * आठ कर्मो के जघन्य अनुभागका भी संक्रामक होता है और अजघन्य अनुभागका भी संक्रामक होता है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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