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________________ ४४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ ६१२३. सुगमं। ॐ जहएणुकस्सेण एमसमत्रो। ६ १२४. कुदो ? समयाहियावलियअक्खीणदंसणमोहणीयं मोत्तण पुवावरकोडीसु तदसंभवणियमादो। * अजहणणाणुभागसंकामश्री केवचिरं कालादो होदि ? ६१२५. सुगमं जहणणेण अंतोमुहत्तं । ६ १२६. णिस्संतकम्मियमिच्छाइट्ठिणा सम्मत्ते समुप्पाइदे लद्धप्पसहावस्स सम्मत्ताजहण्णाणुभागसंकमस्स सबलहुखवणाए जहण्णाणुभागसंकमेण विणासिदतब्भावस्स तेतियमेत्तकालावट्ठाणदंसणादो। 8 उक्कस्सेण वेछावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ६१२७. उकस्साणुभागसंकमकालस्सेव एदस्स परूवणा कायव्वा । * एवं सम्मामिच्छत्तस्स। ६१२८. जहा सम्मत्तस्स जहण्णाजहण्गाणुभागसंकामयकालपरूवणा कया तहा सम्मामिच्छत्तस्स वि कायव्वा ति भणिदं होइ । संपहि एत्थतणविसेसपरूवणट्ठमुत्तरसुतं ६ १२३.९यह सूत्र सुगम है। * जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। ६१२४. क्योंकि कालकी अपेक्षा एक समय अधिक श्रावलिसे युक्त दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवाले जीवको छोड़कर उससे पूर्वके और आगके समयोंमें सम्यक्त्वके जघन्य अनुभागका संक्रम असम्भव है ऐसा नियम है। * उसके अजघन्य अनुभागके संक्रामकका कितना काल है ? ६ १२५. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य काल अन्तमुहूर्त है। ६ १२६. जो सम्यक्त्वकी सत्तासे रहित मिथ्यादृष्टि जीव सम्यक्त्वके उत्पन्न होने पर उसकी सत्ता प्राप्त करके सम्यक्त्वका अजघन्य अनुभागसंक्रम करने लगता है। तथा जो अतिशीघ्र क्षपणामें जघन्य अनुभागसंक्रमके द्वारा अजघन्य अनुभागसंक्रमको नष्ट कर देता है उसके उतने काल तक अजघन्य अनुभागसंक्रमका अवस्थान देखा जाता है। * उत्कृष्ट काल साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है। ६ १२७. उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमके कालके समान इसकी प्ररूपणा करनी चाहिए। * इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वका काल जानना चाहिए । ६ १२८. जिस प्रकार सम्यक्त्वके जघन्य और अजवन्य अनुभागके संक्रामकके कालका कथन किया है उसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वका भी करना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अब यहाँ सम्बन्धी विशेषताका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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