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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बन्धगो ६ ६ ६३. खागचरिमाणुभागबंध चरिमसमय जिल्ले गम्मि जहण्णभावं पडि विसेसा - भावाद | वर माणसं जलगस्स कोह- माणोद एहि मायासंजलणस्स वि कोह- माण- मायासंजलणाणं तिण्हमण्णदरोदएण चढिदम्मि जहण्णसामित्तं होइ । * लोहसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ६ ६४. सुगमं । * समयाहियावलियचरिमसमयसकसाच खवगो | ३६ ६५. कुदो एत्थ जहण्णभावो १ ण, सुहुमकिट्टीए अणुसमयमणंतगुणहाणिसरूवेण अंतोमुहुत्तमेत्तकालमोवविदाए तत्थ सुड्डु जहण्णभावेण संकमुवलंभादो । * इत्थवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामओ को होइ ? ६ ६६. सुगमं । * इत्थवेदक्खवगो तस्सेव चरिमाणुभागखंडएं वट्टमाणओ । ် ६७. एस्थिथिवेद विसेसणमणत्थयं, परोदएण वि सामित्तविहाणे विरोहाभावादो त्तिणासंकणि, उदाहरणपदंसणमेदस्स परूवणादो । ९३. क्योंकि क्षपकसम्बन्धी अन्तिम अनुभागबन्धका अन्तिम समय में निर्लेपन करनेवाले जीवके वन्य अनुभागसंक्रम होता है इस अपेक्षासे क्रोधसंज्वलनसे यहाँ कोई बिशेषता नहीं है । इतनी विशेषता है कि क्रोध या मानके उदयसे चढ़े हुए जीवके मानसं ज्वलनका तथा क्रोध, मान और माया इन तीनमें से किसी एकके उदयसे चढ़े हुए जीवके मायासंज्वलनका जघन्य स्वामित्व होता है। * लोभसंज्वलन के जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है ? ६४. यह सूत्र सुगम है । * एक समय अधिक आवलि कालके रहने पर अन्तिम समयवर्ती संक्रामक क्षपक जीव लोभसंज्वलन जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी है । § ६५. शंका —यहां पर जधन्यपना कैसे है । समाधान नह., क्योंकि सूक्ष्म कृष्टिकी उत्तरोत्तर प्रति समय अनन्तगुणहा निस्वरूप से अन्तर्मुहूर्त कालतक अपवर्तना होने के कारण वहाँ पर अत्यन्त जघन्यरूपसे संक्रम प्राप्त हो जाता है । * स्त्रीवेदके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है ? ६६. यह सूत्र सुगम है । * उसीके अन्तिम अनुभाग काण्डकमें विद्यमान स्त्रीवेदी क्षपक जीव स्त्रीवेदके जघन्य अनुभाग संक्रमका स्वामी है । ९६७ यदि कोई ऐसी आशंका करे कि यहां पर स्त्रीवेद विशेषण निरर्थक है, क्योंकि परोदयसे भी स्वामित्वका विधान करने पर कोई विरोध नहीं आता सो उसकी ऐसी आशंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि उदाहरण दिखलाने के लिए यह कथन किया है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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