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________________ ३० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ * एत्तो जहण्णयं। ८०. एत्तो उवरि जहण्णयमणुभागसंकमसामित्तं वत्तइस्सामो ति पइण्णावकमेदं । * मिच्छत्तस्स जहणणाणुभागसंकामो को होइ ? ६८१. किमेइदिओ वेइंदिओ तेइंदिओ चउरिदिओ पंचिंदिओ सण्गी असण्णी बादरो सुहुमो पजत्तो अपजत्तो वा इचादिविसेसावेक्खमेदं पुच्छासुत्तं । __ॐ सुहुमस्स हदसमुप्पत्तियकम्मेण अण्णदरो। ६८२. एत्थ सुहुमग्गहणेण सुहुमणिगोदअपजत्तयस्स गहणं कायव्वं, अण्गत्थ मिच्छत्तजहण्णाणुभागसंकमुप्पत्तीए अदंसणादो । सुहुमणिगोदपजत्तो किण्ण घेप्पदे १ ण, इस परसे दो प्रश्न खड़े हुए–प्रथम तो यह कि जो दर्शनमोहनीयकी क्षपणा नहीं कर रहे हैं, उनकी सत्तावाले ऐसे सब जीव यदि उनके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमके स्वामी माने जाते हैं तो उद्वेलनाके समय जिनका सकर्म आवलिके भीतर प्रविष्ट होता है उनके आवलिप्रविष्ट कर्मका भी उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम मानना पड़ेगा। टीकामें इस प्रश्नको लक्ष्य रख कर जो कुछ कहा गया है उसका भाव यह है कि यद्यपि सूत्रमें 'दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवालेको छोड़ कर जिसके सत्कर्म है' ऐसा सामान्य वचन कहा गया है पर उससे उद्वेलनाके समय प्रावलिप्रविष्ट सत्कर्मत्राले जीवोंको छोड़ कर अन्य सत्कर्मवाले जीवोंको ही ग्रहण करना चाहिए । यद्यपि यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि यह अर्थ कैसे फलित किया गया है सो उसका समाधान यह है कि आवलिप्रविष्ट कर्मका संक्रम आदि नहीं होता ऐसा ध्रुव नियम है, इसलिए इस नियमके अनुसार यह अर्थ सुतरां फलित हो जाता है । दूसरा प्रश्न यह है कि अपूर्वकरणमें प्रथम स्थितिकाण्डकघातके पूर्व उक्त कर्मोका उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम सम्भव है । ऐसी अवस्थामें 'दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवालेको छोड़ कर' यह वचन देना उचित नहीं है। उसका जो समाधान किया है उसका भाव यह है कि यदि इतने अपवादको छोड़ दिया जाय तो दर्शनमोहनीयका क्षपक जीव उत्कृष्ट अनुभागका संक्रामक नहीं होता, इसलिए सूत्रमें अन्य सब अवस्थाओंको ध्यानमें रखकर 'दर्शनमोहनीयके क्षपकको छोड़ कर' यह वचन दिया है। शेप कथन सुगम है। इस प्रकार उत्कृष्ट स्वामित्व समाप्त हुआ। * आगे जघन्य स्वामित्वका कथन करते हैं । ६८. इससे आगे अर्थात् उत्कृष्ट स्वामित्वके कथनके बाद जघन्य अनुभागसंक्रमके स्वामित्वको वतलाते हैं । इस प्रकार यह प्रतिज्ञावाक्य है । * मिथ्यात्यके जघन्य अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है । 8 ८१. एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय,चतुरिन्द्रिय, पञ्चेन्द्रिय,संज्ञी, असंज्ञी,बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त और अपर्याप्त इनसे इसका स्वामी कौन है ? इत्यदि विशेषकी अपेक्षा रखनेवाला यह पृच्छासूत्र है। _* सूक्ष्म एकेन्द्रियके हतसमुत्पत्तिक कर्मके साथ अबस्थित अन्यतर जीव मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागांक्रमका स्वामी है।। ६ ८२. यहाँ सूत्रमें 'सूक्ष्म' पदके ग्रहण करनेसे सूक्ष्म निगोद अपर्याप्त जीवका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि अन्यत्र मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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