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________________ गा०५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे सामित्त ६ ७८. सुगमं । ॐ दसणमोहणीयक्खवयं मोत्तूण जस्स संतकम्ममत्थि तस्स? उक्कस्साणुभागसंकमो। ७६. कुदो ? दसणमोहक्खवयादो अण्णत्थ तेसिमणुभागखंडयघादाभावादो । जइ वि एत्थ सामण्णेण जस्स संतकम्ममत्थि ति वुत्तं तो वि पयरणवसेण संकमपाओग्गं जस्स संतकम्ममथि ति घेत्तव्यं, अण्णहा उव्वेल्लणाए आवलियपविट्ठसंतकम्मियस्स वि गहणप्पसंगादो। दसणमोहक्खवयस्स वि अपुवकरणपविट्ठस्स पढमाणुभागखंडए अणिल्लेविदे उक्कस्साणुभागसंकमो संभवइ । तदो दंसणमोहक्खवयं मोत्तणे त्ति कधमेदं घडदे ? ण, पढमाणुभागखंडए पादिदे संते जो दंसणमोहक्खवओ तस्सेव सुत्ते दंसणमोहक्खवयत्तेण विवक्खियत्तादो। अधवा दंसणमोहक्खवयं मोत्तणण्णस्स जस्स संतकम्ममत्थि तस्स णियमा उक्कस्साणुभागसंकमो, दंसणमोहक्खवयस्स पुण णस्थि णियमो, पढमाणुभागखंडए उक्कस्साणुभागसंकमाणुविद्ध घादिदे तत्थाणुकस्साणुभागसंकमुप्पत्तिदंसणादो ति एसो सुत्ताहिप्पाओ। एवमोघो समत्तो । आदेसेण सबमग्गणासु विहत्तिभंगो । एवमुक्कस्ससामित्तं । संक्रमका स्वामी कौन है। ६७८. यह सूत्र सुगम है। * दर्शनमोहनीयके क्षपकको छोड़ कर जिसके उक्त कर्मो का सच पाया जाता है वह उनके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका स्वामी है। ६७६. क्योंकि दर्शनमोहनीयके क्षपकके सिवा अन्यत्र उक्त कर्मोंका अनुभागकाण्डकघात नहीं होता । यद्यपि यहाँ पर सूत्रमें सामान्यसे 'जिसके सत्कर्म है' ऐसा कहा है तो भी प्रकरणवश संक्रमके योग्य जिसके सत्कर्म है ऐसा ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा उद्वेलनाके समय श्रावलिके भीतर प्रविष्ट हुए सत्कर्मवालेके भी ग्रहणका प्रसङ्ग प्राप्त होता है । शंका-अपूर्वकरणमें प्रविष्ट हुए दर्शनमोहनीयके क्षपकके भी प्रथम अनुभागकाण्डककी अनिलंपित अवस्थामें उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम सम्भव है, इसलिए सूत्रमें 'दर्शनमोहनीयके क्षपकको छोड़ कर' यह वचन कैसे बन सकता है ? समाधान नहीं, क्योंकि वहाँ पर प्रथम अनुभागकाण्डकका पतन करा देने पर जो दर्शन मोहनीयका क्षपक है वही सूत्रमें दर्शनमोहनीयके क्षपकरूपसे विवक्षित है । अथवा दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवालेको छोड़कर अन्य जिसके उक्त कम की सत्ता है उसके नियमसे उक्त कर्मों का उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम होता है। परन्तु दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवाले जीवके ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमसे अनुविद्ध प्रथम अनुभागकाण्डकका घात कर देने पर वहाँ अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमकी उत्पत्ति देखी जाती है। इस प्रकार यह उक्त सूत्रका अभिप्राय है । इस प्रकार ओघप्ररूपणा समाप्त हुई । आदेशसे सब मार्गणाओंमें अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग है । विशेषार्थ-सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमका स्वामी कौन है इस प्रश्नका समाधान करते हुए सूत्र में केवल इतना ही कहा गया है कि दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करनेवाले जीवके सिवा उनकी सत्तावाले अन्य सब जीव उनके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमके स्वामी हैं। १-क०प्रतौ मस्थि त्ति तस्स इति पाठः ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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