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________________ गा ५८] नत्तरपडिपदेससंकमै संकमट्ठाणाण ५०७ ६८४२. जेण कारणेण दोण्हं पि संतकम्मपक्खेवपमाणं सरिस तेण कारणेण माणसकमट्ठाणेहितो कोहस कमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि जादाणि ति भणिदं होदि । स पहि सेसाणं पि कम्माणमेवं चेव कारणपरूवणा कायव्वा ति पदुप्पायणट्ठमुत्तरसुत्तमाह * एवं सेसेसु वि कम्मेसु विणेदव्वाणि । ६८४३. जहा कोह-माणाणमेसो कारणणिद्देसो कओ तहा सेसकम्माणं पिणेदव्यो त्ति भणिदं होइ। संपहि एदस्सेवत्थस्स फुडीकरणट्ठमेदं संदिट्ठीपरूवणं कस्सामो । तं जहा-णिरयगईए माणादीणं जहण्णसंतकम्मेत्तियमेतमिदि घेत्तव्वं ४, ५, ६, ७। तेसिं चेवुक्कस्ससतकम्मपमाणमेदं २०, २५, ३०, ३५ । एत्थुक्कस्सदव्वादो जहण्णदव्वे सोहिदे सुद्धसेसदव्यपमाणमेत्तियं होइ १६. २०, २४, २८ । सव्वेसिं संतकम्मपक्खेवपमाणं दोरूवमेत्तमिदि घेत्तव्यं २ । एदेण पमाणेण अप्पप्पणो जहण्णदव्वादो उपरि कमेण सुद्धसेसदब्बे पवेसिजमाणे तत्थ समुप्पण्णमाणपरिवाडीओ एदाओ है । कोहपरिवाडीओ ११ । मायापरिवाडीओ १३ । लोहपरिवाडीओ एदाओ १५ । एवमेत्थ दोसंदिट्ठीए च मोणादिसकमट्ठाणेहितो कोहादिसकमट्ठाणाणं विसेसाहियत्तम दिद्धं सिद्धं । एवमप्पाबहुए समत्ते सकमट्ठाणपरूवणा समत्ता तदो पदेसस कमो समत्तो । एवं गुणहीणंवा गुगविसिट्टमिदि पदस्स अत्यविहासाए समत्ताए तदो पंचमीए मूलगाहाए अत्थपरूवणा समत्ता ८४२. जिस कारणसे दोनोंके ही सत्कर्मप्रक्षेपका प्रमाण समान है इस कारणसे मानके संक्रमस्थानोंसे क्रोधके संक्रमस्थान विशेष अधिक हो जाते हैं यह उक्त कथन का तात्पर्य है । अब शेष कर्मोकी भी इसी प्रकार कारण प्ररूपणा करनी चाहिए इस बातका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * इस प्रकार शेष कर्मो में भी ले जाना चाहिए। ६८४३. जिस प्रकार क्रोध और मानके इस कारणका निर्देश किया उसी प्रकार शेष कर्मोंका भी जानना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब इसी अर्थको स्पष्ट करनेके लिए इस संदृष्टिका कथन करेंगे। यथा - नरकगतिमें मानादिकका जघन्य सत्कर्म इतना है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए ४, ५, ६, ७ । उन्हींके उत्कृष्ट सत्कर्मका प्रमाण इतना है-२०, २५, ३०, ३५ । यहाँ उत्कृष्ट द्रव्यमेंसे जघन्य द्रव्यके घटा देने पर शुद्ध शेष द्रव्यका प्रमाण इतना होता है१६, २०, २४, २८ । सबके सत्कर्मप्रक्षेपका प्रमाण दो अंक प्रमाण है ऐसा ग्रहण करना चाहिए-२। इस प्रमाणसे अपने अपने जघन्य द्रव्वके ऊपर क्रमसे शुद्ध शेष द्रव्यको प्रविष्ट कराने पर वहाँ पर मानपरिपाटिया इतनो ६ उत्पन्न होती हैं, क्रोध परिपाटियाँ ११ उत्पन्न होती हैं, माया परिपाटियाँ १३ उत्पन्न होती हैं और लोभपरिपाटियों इतनी १५ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार यहाँ पर दो संदृष्टियोंके द्वारा मानादिके संक्रमस्थानोंसे क्रोधादिकके संक्रमस्थान विशेष अधिक असंदिग्ध. रूपसे सिद्ध होते हैं । इस प्रकार अल्पबहुत्वके समाप्त होने पर संक्रमस्थान प्ररूपणा समाप्त हुई। इसके बाद प्रदेशसंक्रम समाप्त हुआ। इस प्रकार 'गुणहीणं वा गुणविसिद्धं' इस पेदकी अर्थ विभापा समाप्त होने पर पाँचवीं मूलगाथाकी अर्थप्ररूपण समाप्त हुई।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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