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________________ गा ५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे संकमट्ठाणाणि ૫૦૧ सुत्तेण माणसतकम्मपक्खेवपमाणं जाणाविय सपहि कोहस्स वि संतकम्मपक्खेवो एत्तिओ चेव होदि ति जाणावणट्ठमुत्तरसु तमाह * तत्तिमेत्ते चेव पदेसग्गे कोहस्स जहएणसंतकम्मट्ठाणे पक्खित्ते कोहस्स विदियसंकमाणपरिवाडी। ६८४१. एदस्स सुत्तस्स अत्थो वुच्चदे-कोहसतकम्मपक्खेवे समुप्पाइजमाणे माणविदियसकमट्ठाणविसेसस्सासखेजलोगपडिभागिओ ति पुव्वसुत्ते जो परूविदो सो चेवाणणाहिओ एत्थ वि अवलंबेयव्यो, पयडिविसेसण विस साहियकसोयणोकसायपयडिसुत्तस्सावद्विदभावभुवगमादो। अणवट्ठिदसतकम्मपक्खेवन्भुवगमे तत्थतणस कमद्वाणाणं विसेसाहियभावाणुववत्तीदो। तम्हा अवट्ठिदसतकम्मपक्खेवावलंबणेण तेसि विसेसाहियत्तमेवमणुगंतव्वं । तं जहा-अपच्चक्खाणमाणकोहाणं दोण्हं पि जहण्णसतकम्मभप्पप्पणो उकस्सदव्वादो सोहिदसुद्धसेसदचम्मि कोहपयडिविसेसमेत्तदव्वमवणिय पुध दुवेयव्वं । एवं पुध हविदे सुद्धसेसदव्वं दोण्हं पि समाणं होइ । पुणो एदं दव्वमसंखेजलोगमेत्तभागहारमवट्ठिदपमाणं दोसु उद्देसेसु विरलिय समखंडं कादण दिण्णे दोण्हं पि संतकम्मपक्खेवा सरिसा होदूण विरलणरूवं पडि पार्वति । एत्थेगेगसतकम्मपखेक्वं घेत्तण अप्पप्पणो पडिरासिदजहण्णसंतकम्मप्पहुडि परिवाडीए पक्खिविजमाणे दोण्हं पि जानकर अब क्रोधका भी सत्कर्म प्रक्षेप इतना ही होता है यह जतानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * उतने ही प्रदेश क्रोधके जघन्य सत्कर्मस्थानमें प्रक्षिप्त करनेके लिए क्रोधकी दूसरी संक्रमस्थान परिपाटी होती है। ३१. इस सूत्रका अर्थ कहते हैं-क्रोध सत्कर्मके प्रक्षेपके उत्पन्न करने पर मानके द्वितीय संक्रमस्थान विशेषका असंख्यात लोक प्रतिभाग सम्बन्धी पूर्व सूत्र में जो कहा है उसीका न्यूनाधिकतासे रहित यहाँ पर भी अवलम्बन करना चाहिए, क्योंकि प्रकृत सूत्र प्रकृतिविशेषताके कारण विशेषाधिकरूपसे कषाय और नोकषायोंमें अवस्थितरूपको स्वीकार करता है । अनवस्थित सत्कर्मप्रक्षेपके स्वीकार करने पर वहाँके संक्रमस्थानोंमें विशेषाधिकपना नहीं बन सकता । इसलिए अवस्थित सत्कर्म प्रक्षेपका अवलम्बन करनेसे उनका विशेषाधिकपना ही स्वीकार करना चाहिए । यथा-अप्रत्याख्यान मान और क्रोध इन दोनोंके भी जघन्य सत्कर्मको अपने अपने द्रव्यमेंसे घटाकर जो शुद्ध शेष द्रव्य हो उसमेंसे क्रोध प्रकृतिके विशेषमात्र द्रव्यको निकालकर पृथक स्थापित करना चाहिए । इस प्रकार पृथक स्थापित करने पर शुद्ध शेष द्रव्य दोनोंका ही समान होता है । पुनः इस द्रव्यको, अवस्थित प्रमाण असंख्यात लोकमात्र भागहारको दो स्थानों पर विरलन कर उस पर समान खण्ड करके देनेपर प्रत्येक विरलनके प्रति दोनोंके सत्कर्मप्रक्षेप सदृश होकर प्राप्त होते हैं । यहाँ एक एक सत्कर्मप्रक्षेपको ग्रहण कर अपने अपने प्रतिराशिरूप जघन्य सत्कर्मसे लेकर क्रमसे प्रक्षिप्त करने
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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