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________________ ४७२ जयधवला सहिदे कषायपाहुण्डे [ बंधगो सत्थाणे तेसिं पुणरुत्तभावो अस्थि त्ति तत्थ पुन्त्रविह। रोण पुणरुत्ताणमवणयणं काढूणापुणरुत्ताणं चैत्र गहणं कायव्यं । एवमपुत्रकरणमस्तिऊण संकमद्वाणपरूवणा समत्ता । १७७२. संपहि अणियट्टिकरणनस्सिऊण संकमद्वाणपरूवणे कीरमाणे अणिय ट्टि - कालब्भंतरे थोवराणि चैव संकमट्ठाणाणि लन्मंति । किं कारणं ? अणियट्टिपरिणामो समयं पडि एक को चेत्र होदि ति परमगुरूवएसोदो । तं जहा - खविदकम्मंसियलक्खणेणागंतूण पढमसम्मत्तमुप्पाइय वेदयसम्मत्तपडिवत्तिपुरस्सरं वेछावट्टिसागरोवमाणि परिभमिय दंसणमोहक्खवणाए अन्भुट्टिय अधापवत्तापुव्त्रकरणाणि जहाकमेण बोलाविय अणियट्टिकरणं विस पढमसमए जहण्णस त कम्मणिबंधणगुण संकममस्सिऊण जहण्णसंक मट्ठाणमेक्कं चेत्र समुप्पजदि । एवं बिदियादिसमासु वि जहण्णसंतकम्ममस्सिऊण एक्केक' चैत्र संकमद्वाणमुप्पाइय दव्वं जाव अणियट्टिकरणचरिमसमयो ति । एवमुप्पादे जहण संतकम्ममस्सिऊणा णिय द्विअद्धा मेत्ताणि चैव संकमट्टणाणि अण्णो पेक्खिऊणा संखेजगुणवडीए समुप्पण्णाणि । तदो पढमपरिवाडी समत्ता । ७७३. संपहि एदम्हादो जहण्गसंतकम्मादो एगसंतकम्म पक्खेवमेत्तमहियं कादूणागदस्स ं अणियट्टिपढमसमए : अण्णमपुणरुत्तसंकमा णमसंखेजलोगभागन्भहियदि । पुणो दस चैव विदियसमए असंखेज्जगुणवडीए विदियसंकमट्ठाणमुपञ्जदि । A है कि स्वस्थानमें उनका पुनरुक्त भाव है इसलिए वहाँ पर पूर्व विधिसे पुनरक्त संक्रमस्थानोंका अपनयन करके पुनरुक्त संक्रमस्थानोंका ही ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार अपूर्वकरणका श्राश्रय कर संक्रमस्थान प्ररूपेणा समाप्त हुई । ७७२. अव अनिवृत्तिकरणका आश्रय कर संक्रमस्थानोंका कथन करने पर अनिवृत्तिकरण के काल के भीतर स्तोकतर ही संक्रमस्थान प्राप्त होते हैं, क्योंकि अनिवृत्तिकरणका परिणाम प्रत्येक समय में एक एक ही होता है ऐसा परम गुरुका उपदेश है । यथा -क्षपित कर्माशिक लक्षण से कर और प्रथम सम्यक्त्यको उत्पन्न कर वेदकसम्यक्त्वकी प्राप्ति पूर्वक दो छयासठ सागर काल तक परिभ्रमण कर तथा दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके लिए उद्यत हो अधःप्रवृतकरण और पूर्वकरणको क्रमसेविताकर अनिवृत्तिकरण में प्रविष्ट हुए जीवके प्रथम समय में जघन्य सत्कर्म निबन्धन गुणसंक्रमका श्राश्रयकर एक ही जघन्य संक्रमस्थान उत्पन्न होता है। इसी प्रकार द्वितीयादि समय में भी जघन्य सत्कर्मका आश्रयकर एक एक ही संक्रमस्थानको उत्पन्न कराकर अनिवृत्तिकरण के अन्तिम समय तक ले जाना चाहिए। इस प्रकार उत्पन्न कराने पर जघन्य सत्कर्मका आश्रय कर अनिवृत्तिकरण के कालप्रमाण ही संक्रमस्थान परस्पर को देखते हुए असंख्यात गुणी वृद्धिरूपसे उत्पन्न होते हैं। इससे प्रथम परिपाटी समाप्त हुई । ६७७३. अब इस जघन्य सत्कर्मसे एक सत्कर्मप्रक्षेपमात्रको अधिक कर आये हुए जीवके निवृत्तिकरण के प्रथम समय में असंख्यात लोकभाग अधिक अन्य अपुनरुक्त संक्रमस्थान उत्पन्न होता है । पुनः इसीके दूसरे समय में असंख्यातगुणा वृद्धिरूपसे दूसरा संक्रमस्थान उत्पन्न होता
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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