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________________ ४३६ गा०५८] उत्तरपयडिपदेससंकमे संकमट्ठाणं ॐ परूवणा जहा।... ६७२७. परूवणाणिओगद्दारं कथं होइ ति पुच्छा एदेण कदा होइ । ®मिच्छत्तस्स अभवसिद्धियपाओग्गेण जहएणएण कम्मेण जहएणयं संकमट्ठाणं। ६ ७२८. एदेण सुत्तेण मिच्छत्तस्स जहण्णसंकमट्ठाणपरूवणा कदा । तं जहाअभवसिद्धियपाओग्गजहण्णकम्मेणे ति वुत्ते एईदिएसु खविदकम्मंसियलक्खणेण कम्महिदिमच्छिऊण संचिदजहण्णसंतकम्मस्स गहणं कायव्वं, तत्तो अण्णस्स अभवसिद्धियपाओग्गजहण्णसंतकम्मस्साणुवलद्धीदो । एदेण जहण्णकम्मेण सबजहण्णसंकमट्ठाणं समुप्पजदि ति ऐसो विसेसो एत्थाणुगंतव्यो। तं कधं ? एदेण जहण्णकम्मेणागंतूण असण्णिपंचिदिएसुववञ्जिय पजत्तयदो होदूण तत्थ देवाउअंबंधिय सबलहुंकालं कोण देवेसुक्वजिय छहिं पजत्तीहिं पजत्तयदो होदूण पढमसम्मत्तमुप्पाइय तदो वेदयसम्मत्तं पडिवजिय वेछावद्विसागरोवमाणि सम्मत्तमणुपालिय तदवसाणे अंतोमुहुत्तसेसे दसणमोहक्खवणाए अब्भुट्टिदो जो जीवो तस्स अधापवत्तकरणचरिमसमये वट्टमाणस्स जहण्णपरिणामणिबंधणविज्झादसंक्रमेण सबजहण्णपदेससंकमट्ठाणं होइ। कधमेसो विसेसो * प्ररूपणा, यथा । ६७२७. प्ररूपणा अनुयोगद्वार किस प्रकारका है यह पृच्छा इस सूत्र द्वारा की गई है। * मिथ्यात्वका अभव्योंके योग्य जघन्य कर्मके आश्रयसे जघन्य संक्रमस्थान होता है। ६७२८. इस सूत्र द्वारा मिथ्यात्वके जघन्य संक्रमस्थानकी प्ररूपण की गई है। यथअभव्योंके योग्य जघन्य कर्मके आश्रयसे ऐसा कहने पर एकेन्द्रियोंमें क्षपितकर्मा शिकलक्षणसे कर्मस्थितिकाल तक अवस्थित रहकर सञ्चित हुए जघन्य सत्कर्मका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उससे अन्य अभव्योंके योग्य जघन्य सत्कर्म नहीं उपलब्ध होता। इस जघन्य सत्कर्मके आश्रयसे सबसे जघन्य संक्रमस्थान उत्पन्न होता है इस प्रकार इतना विशेष यहाँ पर जान लेना चाहिए। शंका-वह कैसे ? समाधान-इस जघन्य कर्मके साथ आकर, असंज्ञी पञ्चेन्द्रियोंमें उत्पन्न होकर तथा पर्याप्त होकर पुनः वहाँ देवायुका बन्धकर अतिशीघ्र मरकर और देवोंमें उत्पन्न होकर तथा छह पर्याप्तियोंसे पर्याप्त होकर इसके बाद प्रथम सम्यक्त्वको उत्पन्न कर फिर वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त कर दो छयासठ सागर कालतक सम्यक्त्वका पालन कर उसके अन्तमें अन्तमुहूर्त काल शेष रहने पर जो जीव दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके लिए उद्यत हा है उसके अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें विद्यमान होने पर जघन्य परिणामनिमित्तक विध्यातसंक्रमरूपसे सबसे जघन्य प्रदेश संक्रमस्थान होता है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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