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________________ ४१४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधग ६ सगबंधपारंभादो आवलियचरिमसमये वट्टमाणस्स जहण्णसामित्तविहाणमेदं१ हिरवजं । ६६८४. तत्थ वि पढमसमयहस्सरदिबंधगम्मि को वि विसेसो अत्थि ति पदुप्पायणट्ठमाह–'पढमसमयहस्स-रदिबंधगस्स' इचादि । किमट्ठमेत्थतणबंधो अधापवत्तसंकमेण पडिच्छिञ्जमाणसेसपयडिदव्वागमो च जहण्णो इच्छिञ्जदे ? ण, अण्णहा वडि सामित्तस्स जहण्णभावाणुववत्तीदो । तदो वड्डिसामित्तं पडुच वुत्तमेदं ति दट्टव्वं । हाणितानित्तावेक्खाए पुण तत्थतणबंधागमाणं जहण्णुक्कस्सभावेण किंचि पयदोवजोगफलमत्थि, तब्बंधावलियचरिमसमए चे हाणिसामित्तस्स जहण्गभावविहाणादो। यदाह-'तस्स आवलियहस्स-रदिबंधमाणगस्स जहणिया हाणि' ति । किं कारणं ? एत्तो उपरिमसगबंधमाहप्पेण वडिविसये हाणिसामित्तविहाणाणुववत्तीदो। * तस्सेव से काले जहणिया वड्डी। ६६८५. तस्सेवाणंतरणिहिट्ठहाणिसामियस्स तदणंतरसमए जहणिया वड्डी होइ । कि कारणं १ पुधमादिट्ठजहण्गबंधागमाणं ताघे संकमपाओग्गभावेण ढुक्माणंजहण्णवडिकारणत्तादो। तदो होणिसामित्तसमयभाविसंकमदव्वे वहिसामित्तसमयसंकमदव्वादो तक संक्रम नहीं देखा जाता । इसलिए अपने बन्धके प्रारम्भसे लेकर एक आवलिकालके अन्तिम समय में विद्यमान हुए जीवके यह जघन्य स्वामित्वका विधान निर्दोष है। ६६८४. उसमें भी हास्य-रतिका प्रथम समयमें बन्ध करनेवाले जीवके कुछ विशेषता है इस बातका कथन करनेके लिए कहा है-'पढमसमयहस्स-रदिबंधगस्स' इत्यादि। शंका _यहाँ होनेवाला बन्ध और अधःप्रवृत्तसंक्रमके द्वारा प्रतिग्राह्यमान शेष प्रकृतियोंके द्रव्यका आगमन जघन्य क्यों स्वीकार किया गया है ? समाधान नहीं, क्योंकि अन्यथा वृद्धिका स्वामित्व जघन्य नहीं बन सकता, इसलिए वृद्धिके स्वामित्वको लक्ष्य कर यह कहा है ऐसा जानना चाहिए। हानिके स्वामित्वको विवक्षा होने पर तो बहाँ होनेवाले बन्ध और अधःप्रवृत्तसंक्रम द्वारा प्राप्त होनेवाली आयका जघन्य और उत्कृष्टपना प्रकृतमें कुछ भी उपयोगी फलवाला नहीं है, क्योकि उसकी बम्धावलिके अन्तिम समयमें ही हानिके स्वामित्वके जघन्यपनेका विधान किया है। इसलिए कहा है-'तस्स आवलियहस्स-रदिबंधमाणगस्स जहण्णिया हाणी। क्योंकि इसके आगे अपने बन्धके माहात्म्यवश वृद्धिका स्थल प्राप्त होने पर हानिके स्वामित्वका विधान नहीं बन सकता। * उसीके तदनन्तर समयमें जघन्य वृद्धि होती है। ६६८५. जो अनन्तर पूर्व हानिका स्वामी कह आये हैं उसीके तदनन्तर समयमें जघन्य वृद्धि होती है, क्योंकि पूर्वमें कहे गये जो बन्ध और आगम द्रव्य हैं जो कि संक्रम प्रायोग्यरूपसे प्राप्त होनेवाले हैं वे उस समय जघन्य वृद्धिके कारण हैं। इसलिए हानिके स्वामित्वके समयमें होनेवाले संक्रमद्रव्यको वृद्धिके स्वामित्वके समयके संक्रम द्रव्यमेंसे घटा देने पर जो शुद्ध शेष बचे १. आ प्रतौ मेत्त (दं) इति पाठः ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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