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गा० ५८ ]
उत्तरपर्याडपदेससंकमे पदणिक्खेवो
सुत्ताणुसारेण वत्तं । एत्थ हाणिदव्त्रपमाणे आणि मागे सम्माइट्ठिपढमसययविज्झादसंकमदव्यमधापवत्तसं कमदव्यादो सोहिदे सुद्धसेसमेतं होइ त्ति वत्तव्वं । तदो विज्झादगुणमणिहाणिदव्वादो पयदहाणिदव्वमसंखेञ्जगुणमिदि तप्परिहारेणेत्थेव सामित - विाणमविरुद्धं सिद्ध । अधापवत्तसंक्रमादो उब्वेल्लणासंक्रमेण परिणदमिच्छाइट्ठिम्मि पयदुकस्ससामित्तावलंबणे सुट्टु लाहो दिस्सदि ति णासंकणिअं उब्वेल्लणाहिमुहस्स अधापवत्तसंक्रमादो एत्थतणअधापवत्तसंकमस्त परिणामपाहम्मेण बहुत्तोवलंभादो । खेदमसिद्धं, दादो चैत्र सोमित्तसुतादो तस्सिद्धीए ।
* अणंताणुबंधोणमुक्कस्सिया वड्डी कस्स ? ६६२३. सुगभं ।
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* गुणदकम्म' सियस्स · सव्वसंकामयस्स ।
६६२४. गुणिक मंसियलक्खणेणागतूण सव्वलहुं त्रिसंजोयणाए अब्भुट्ठिदस्स चरिमफालीए सन्धसंक्रमेण पयदुकस्ससामित्तं होइ, तत्थ किंचूणकम्मट्ठिदिसंचयस्स वरूण संकंतिदंसणादो ।
* उक्क स्सिया हाणी कस्स ? ६२५. सुगमं
६६२३. यह सूत्र सुगम है ।
* सर्वसंक्रामक गुणितकर्माशिक जीवके होती है ।
शेष कथन सूत्र के अनुसार करना चाहिए । यहाँ पर हानिका द्रव्यप्रमाण लापर सम्यग्दृष्टि प्रथम समय के विध्यातसंक्रम द्रव्यको अधःप्रवृत्तसंक्रमके द्रव्यमेंसे घटा देने पर जो शेष बचे उतना होता है ऐसा कहना चाहिए। इसलिए विध्यात और गुणसंक्रमसे उत्पन्न हुए हानिद्रव्यसे प्रकृत हानिद्रव्य असंख्यातगुणा होता है, इसलिए उसका परिहार करके यहीं पर स्वामित्वका विधान श्रविरुद्ध सिद्ध होता है । अधःप्रवृत्तसंक्रमसे उद्वेलनासंक्रमके द्वारा परिणत हुए मिध्यादृष्टि जीव में प्रकृत उत्कृष्ट स्वामित्वका अवलम्बन करने पर अच्छा लाभ दिखाई देता है। ऐसी आशंका भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उद्वेलनाके अभिमुख हुए जीवके होनेवाले अधःप्रवृत्तसंक्रमसे यहाँ पर होनेवाला अधःप्रवृत्तसंक्रम परिणामोंके माहात्म्यवश बहुत उपलब्ध होता है। और यह सिद्ध भी नहीं है, क्योंकि इसी स्वामित्व सूत्रसे उसकी सिद्धि होती है ।
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* अनन्तानुबन्धियोंकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ?
जीवके
६६२४. गुणितकर्मा' शिकलक्षण से आकर अतिशीघ्र विसंयोजना करनेमें उद्यत हुए: चरम फालिका सर्वसंक्रम करनेपर प्रकृत उत्कृष्ट स्वामित्व होता है, क्योंकि वहाँ पर कुछ कम कर्मस्थिति सञ्चयकी वृद्धिरूपसे संक्रान्ति देखी जाती है ।
* उत्कृष्ट हानि किसके होती है ?
६ ६२५. यह सूत्र सुगम है ।