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________________ ३४० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो६ पडिवादेण लद्धमंतरमेत्थ कायव्वं । * इत्थिवेवस्स भुजगारसंकामयंतरं केवचिरं कालावो होवि ? ६४६६. सुगमं । ® जहणणेण एयसमझो। ६४६७. सगबंधणिरुद्धयसमयमेतपडिवक्खबंधकालावलंबणेण पयदंतरसाहणं कायव्वं । ॐ उकस्सेण घेछावठिसागरोषमाणि संलेजवस्सन्महियाणि । ६४६८. कुदो ? तदप्पयरसंकमुकासकालस्स पयदंतरत्तेण विवक्खियत्तादो। * अप्पयरसंकामयंतरं केवचिरं कालावो होदि ? ६४६६. सुगम । * जहणणेणेयसमभो। ६४७०. कुदो ? पडिवक्खबंधणिरुद्ध यसमयमेतसगबंधकालम्मि तदुवलंभादो । * उकास्सेण अंतोमुत्तं । ६४७१. कुदो ? सगबंधगद्धामेतभुजगारकालावलंबणेण पयदंतरसमत्थणादो । * अवत्तव्वसंकामयंतर केवचिरं कालादो होवि ? द्वारा पुनः अवक्तव्य संक्रम प्राप्त होनेसे यहाँ पर उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त कर लेना चाहिए। * स्त्रीवेदके भुजगार संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ६४६६. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तरकाल एक समय है। ६४६७. अपने बन्धके रुकने पर प्रतिपक्ष प्रकृतिके एक समय तक होने वाले बन्धका अवलम्बन लेनेसे प्रकृत अन्तरकालकी सिद्धि कर लेनी चाहिए। *उत्कृष्ट अन्तरकाल संख्यात वर्षे अधिक दो छयासठ सागर प्रमाण है। ६४६८. क्योंकि प्रकृत अन्तरकालरूपसे उसके अल्पतर संक्रमका उत्कृष्ट काल विवक्षित है। * अल्पतर संक्रामकका अन्तरकाल कितना है ? ६४६६. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तरकाल एक समय है। ६४७०. क्योंकि प्रतिपक्ष प्रकृतिके बन्धके रुकने पर एक समय मात्र अपने बन्धकालमें उसकी उपलब्धि होती है। * उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तमुहूर्त है। ६ ४७१. क्योंकि अपने बन्धकाल मात्र भुजगार कालका अवलम्बन लेनेसे:प्रकृत अन्तर कालका समर्थन होता है। * अवक्तव्य संक्रामकका अन्तरकाल कितना है?
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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