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________________ गा०५८ ] उत्तरपयडिपदेससंकमे भुजगारो २६६ लिया समयूणा भुजगारसंकमो होज्ज । एवमेदेसु तिसु कालेसु मिच्छुत्तस्स भुजगार संकमो । ६३२२. दाणि सुत्ताणि सुगमाणि । देसि पुणरुत्तभावो ण आसंकणिज्जो; पुव्वुत्तत्थो व संहारमुहेण पयट्टाणं तहाभावविरोहादो । एवमेत्तिएण पबंधेण मिच्छत्तभुजगार संकमसामित्तं परूविय संपहि सेसपदाणं सामित्तविहाणमुत्तरपबंधमाह - * सेसेसु समएसु जइ संकामगो अप्पयरसंकामगो वा श्रवत्तव्वसंकामगो वा । § ३२३. पुव्वत्तोत्रसामगखागगुणसंकमकालं पुप्पण्णसम्मत्तमिच्छाइट्ठि पच्छायदवेदयसम्माट्ठि पढमावलिय विदियादि समय च मोत्तण सेसेसु समएस जई मिच्छत्तस्स कामगो तो जहासंभवं सो अप्पयरसंकामगो अवतव्य कामगो वा होदि त्ति घेतव्त्रो; पयारंत संभवादो | * उवदिसंकामगो मिच्छत्तस्स को होइ ? ९ ३२४. सुगमं । * पुव्वुप्पादिदेष सम्मत्तेण जो सम्मत्तं पडिवज्जदि जाव आवलियसम्माइट्ठिन्ति एत्थ होज्ज अवट्ठिदसंकामगो अम्मि पत्थि । तक और उत्कृष्टसे एक समय कम एक आवलितक भुजगार संक्रम हो सकता है । इस प्रकार इन कालोंके भीतर मिथ्यात्वका भुजगार संक्रम होता है । § ३२२. ये सूत्र सुगम हैं । ये सूत्र पुनरुक्त हैं ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूर्वोक्त अर्थके उपसंहार द्वारा ये सूत्र प्रवृत्त हुए हैं, इसलिए पुनरुक्त दोष होने में विरोध आता है । इस प्रकार इतने प्रबन्धद्वारा मिथ्यात्व के भुजगारसंक्रमके स्वामित्वका कथन करके अब शेष पदों के स्वामित्वका कथन करनेके लिए आगेके सूत्र प्रबन्धको कहते हैं * शेष समयों में यदि संक्रामक है तो या तो अल्पतरसंक्रामक होता है या अवक्तव्य संक्रामक होता है । ३२३. पूर्वोक्त उपशामक और क्षपकके गुणसंक्रमके कालको छोड़कर तथा पूर्वोत्पन्न सम्यक्त्व पूर्वक मिध्यादृष्टि होकर जो पुनः वेदकसम्यग्दृष्टि हुआ है उसकी प्रथमावलिके द्वितीयादि समयको छोड़कर शेष समयों में यदि मिथ्यात्वका संक्रामक होता है तो यथासम्भव वह अल्पतरसंक्रामक या अवक्तव्यसंक्रामक होता है ऐसा यहाँ पर ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि अन्य कोई प्रकार नहीं है । * मिथ्यात्वका अवस्थित संक्रामक कौन है ? ९ ३२४. यह सूत्र सुगम है । * पूर्व उत्पादित सम्यक्त्वके साथ जो सम्यक्त्वको प्राप्त होता है वह सम्यग्दृष्टि होनेके एक आवलिकाल तक इस अवस्थामें अवस्थितसंक्रामक हो सकता है । अन्यत्र अवस्थितसंक्रामक नहीं होता ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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