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________________ गा० ५८ उत्तरपय उपदेसकमे पाहु २८५ जेसा तिरिक्खगड़सामण्णपणा देसामासिया तेणेसो सव्त्रो अत्थविसेसो एत्यंत भूदो ति goat | संपहि देवईए णाणत्तपदपायणमुत्तरसुत्तमाह * देवगईए णाणत्तं; एवंसयवेदादो इत्थिवेदो असंखेज्जगुणो । ६ २८५. देवगईए विणिरयगईभंगेणपाबहुअंगदव्वं । तं सवेदजहणपदेस संक्रमादो उवरि इत्थिवेद जहण्णपदेस संकमो असंखेज्जगुणो कायव्त्रो ति । रिगईए तिरिक्खगईए च इथिवेदादो णवुंसयवेदस्स संखेज्जगुणत्तोवलं भादो । किं कारणमेदं गाणत मिदि चे बुच्चदे - मयवेदस्य तिपत्तिदोमिस गलिद सेसस्स वेलावसागरोवमपरिन्भमणेण देवगईए जहण्यसा मित्तं । इत्थवेदस्स पुण तिपलिदो मिएस अणुपाइय ओघभंगेण वेछावद्विसागरोमाणि गालाविय जहण्णसामित्तविहाणमेदेण कारणेण णाणत्तमेदं णादव्वं । § २८६. एवं गइमग्गणाए अप्पाबहुअविणिण्णयं काढूण संवहि सेसमग्गणाणमुत्रलक्खणभावेइ दिए पयद्याबहुअपरूवणमुत्तरं सुत्तपबंधमवत्तइस्लामो | इंदिए सव्वत्थोवो सम्मत्ते जहणपदेससंकमो । २८७. सुगमं । की मुख्यता से देशामर्पक है, इसलिए यह सब अर्थ विशेष इसमें अन्तर्भूत है ऐसा जानना चाहिए । अब देवगतिमें नानात्वका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * देवगतिमें इतना भेद है कि नपुंसकवेदसे खीवेद असंख्यातगुणा है । २८५. देवगति में भी नरकगतिके समान अल्पबहुत्व जानना चाहिए । परन्तु इतना भेद है कि नपुंसक वेद के जघन्य प्रदेशसंक्रमसे आगे स्त्रीवेदका जघन्य प्रदेशसंक्रम असंख्यातगुणा करना चाहिए, क्योंकि नरकगति और तिर्यञ्चगतिमें स्त्रीवेदसे नपुंसक वेद संख्यातगुणा उपलब्ध होता है । शंका- नानात्वका क्या कारण है ? समाधान- - कहते हैं - नपुंसकवेदका तीन पल्यकी आयुवालोंमें गलकर जो अन्तमें शेष बचता है उसके साथ दो छयासठ सागर कालके भीतर परिभ्रमण करने के अनन्तर देवगति में जघन्य स्वामित्व प्राप्त होता है | परन्तु स्त्रीवेदका तीन पल्यकी आयुवालोंमें उत्पन्न न कराकर घ समान दो छ्यासठ सागर काल गला कर जघन्य स्वामित्व कहा गया है । इस कारण से अल्पबहुत्व सम्बन्धी यह भेद जान लेना चाहिए । ९ २८६ . इस प्रकार गतिमार्गणा में अल्पबहुत्वका लक्षणरूपसे एकेन्द्रिययोंमें प्रकृत अल्पबहुत्वका कथन बतलाते हैं निर्णय करके अब शेषमार्गणाओं के उपकरनेके लिए आगे के सूत्रप्रबन्धको * एकेन्द्रियों में सम्यक्त्वका जघन्य प्रदेशसंक्रम सबसे स्तोक है । ६२८७. यह सूत्र सुगम है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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