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________________ २७२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे * माणसंजलणे उक्कस्संपदेससंकमो विसेसाहिओ । ९ २३६. केत्तियमेत्तो विसेसो १ पुरिसवेददन्त्रस्स सादिरेयचउब्भागमेत्तो । * कोहसंजलणे उक्कस्सपदेससंकमो विसेसाहिओ । * मायासंजलणे उक्कस्सपदेस संक्रमो विसेसाहिओ । * लोहसंजलणे उक्कस्स पदेस संकमो विसे साहिओ । [ बंधगो ६ २३७. दाणि मुत्ताणि पयडिविसेसमेत कारणपडिबद्धाणि सुबोहाणि । एवं रियोघो परूविदो | एवं चैव सत्तसु पुढवीसु; विसेसाभावादो । * एवं सेसासु गदीसु दव्वं । ९ २३८. एदेण सुत्तेण सेसगदीणमप्पा बहुअं सूचिदं । तं जहा — तिरिक्खपंचिंदियतिरिक्खतिय देवा भवणादि जाव णवगेवज्जा त्ति णिरयोघो । अणुद्दिसाणुत्तरदेवेसु एवं चेव । raft सम्म कम थि; इत्थि - गवुंसयवेदाणं पि तत्थ विज्झादसंकमो चेवेत्ति विसेसमवहारिऊणप्पा बहुअमणुगंतव्र्व्वं । मणुसतिए ओघभंगो । पंचि०तिरिक्ख- अपज्ज० मणुसअपजस पुरदो भग्णमारोह दिय प्याबहुअभंगो | I * उससे मानसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । ९ २३६. विशेषका प्रमाण कितना है ? पुरुषवेदके द्रव्यका साधिक चतुर्थ भागमात्र विशेष प्रमाण है। * उससे क्रोधसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । * उससे मायासंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । * उससे लोभसंज्वलनका उत्कष्ट प्रदेशसंक्रम विशेष अधिक है । २३७. ये सूत्र प्रकृतिविशेषमात्र कारणसे प्रतिबद्ध हैं, इसलिए सुगम हैं। इस प्रकार सामान्यसे नारकियों में उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम अल्पबहुत्वका कथन किया । इसी प्रकार सातों पृथिवियोंमें जानना चाहिए, क्योंकि उससे यहाँ पर अन्य कोई विशेषता नहीं है । * इसी प्रकार शेष गतियों में ले जाना चाहिए । ६२३८. इस सूत्र द्वारा शेष गतियोंमें अल्पबहुत्वका सूचन किया है । यथा - सामान्य तिर्यन, पञ्चेन्द्रिय तिर्यवत्रिक, सामान्यदेव और भवनवासियोंसे लेकर नौ प्रवेयक तकके देवों में सामान्य नारकियों के समान भङ्ग है। अनुदिश और अनुत्तर देवोंमें इसी प्रकार जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि इनमें सम्यक्त्वका संक्रम नहीं है । तथा वहाँ पर स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका भी विध्यातसंक्रम ही है । इस प्रकार इस विशेषताको जानकर अल्पबहुत्व समझ लेना चाहिए । मनुष्यत्रिकमें श्रोघके समान भङ्ग है । पञ्चेन्द्रिय तिर्यश्व अपर्याप्त और मनुष्य अपर्याप्तकोंमें आगे कहे जाने वाले एकेन्द्रिय सम्बन्धी अल्पबहुत्व के समान भङ्ग है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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