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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो६ * अणुभागसंकमो दुविहो-मूलपयडिअणुभागसंकमो च उत्तरपयडिअणुभागसंकमो च। १. एदस्स सुत्तस्स 'संकामेदि कदि वा' ति गुणहरभडारयस्स मुहकमल विणिग्गयगाहासुत्तावयवपडिबद्धाणुभागसंकमविवरणे पयट्टैण जइवसहपुजपादेण पउत्तस्स पसण्णगंभीरभावेणावद्विदस्स विवरणं कस्सामो। तं जहा-अणुभागो णाम कम्माणं सगकज्जुप्पायणसत्ती । तस्स संकमो सहावंतरसंकंती। सो अणुभागसंकमो ति बुच्चइ । सो वुण दुविहो-मूलुत्तरपयडिपडिबद्धाणुभागसंकमभेदेण, तइयस्स संकमपयारस्साणुवलंभादो। तत्थ मूलपयडीए मोहणीयसण्णिदाए जो अणुभागो जीवम्मि मोहुप्पायणसत्तिलक्षणो तस्स ओकड्डुक्कडणावसेण भावंतरावती मूलपयडिअणुभागसंकमो णाम । उत्तरपयडीणं च मिच्छत्तादीणमणुभागस्स ओकड्डुक्कड्डण-परपयडिसंकमेहि जो सत्तिविपरिणामो सो उत्तरपयडिअणुभागसंकमो ति भण्णदे। एवं दुधाविहत्तो अणुभागसंकमो इदाणिमवसरपत्तो ति विहासिजदि ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्यो । wimwwwxxxmmmm अनुभागसंक्रम दो प्रकारका है-मूलप्रकृतिअनुभागसंक्रम और उत्तरप्रकृतिअनुभागसंक्रम। ६१. अब गुणधर भट्टारकके मुखकमलसे निकले हुए गाथासूत्रके 'संकामेदि कदिं वा' इस अवयवसे सम्बन्ध रखनेवाले अनुभागसंक्रमके विवरणमें प्रवृत्त हुए पूज्यचरण आचार्य यतिवृषभके द्वारा कहे गये और प्रसन्न गम्भीरभावसे अवस्थित हुए इस सूत्रका विवरण करते हैं। यथा--कर्मों की अपने कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्तिका नाम अनुभाग है। उसका संक्रम अर्थात् अन्य स्वभावरूप संक्रान्त होना अनुभागसंक्रम है। वह मूलप्रकृतिअनुभागसंक्रम और उत्तरप्रकृतिअनुभागसंक्रमके भेदसे दो प्रकारका है, क्योंकि संक्रमका तीसरा भेद नहीं उपलब्ध होता। उनमेंसे मोहनीय संज्ञावाली मूल प्रकृतिका जीवमें मोहोत्पादक शक्तिरूप जो अनुभाग है उसका अपकर्षण और उत्कर्षणके कारण अन्य अनुभागरूप परिणम जाना मूलप्रकृतिअनुभागसंक्रम कहलाता है। तथा मिथ्यात्व आदि उत्तर प्रकृतियोंके अनुभागका अकर्षण, उत्कर्षण और परप्रकृतिसंक्रमके द्वारा अन्य अनुभागरूप परिणमन होना उत्तरप्रकृतिअनुभागसंक्रम कहलाता है। इस प्रकार दो भागोंमें विभक्त हा अनुभागसंक्रम इस समय विशेष व्याख्याके लिए अवसरप्राप्त है यह इस सूत्रका भावार्थ है। विशेषार्थ-अनुभागसंक्रमका अर्थ स्पष्ट है। यहाँ पर जिस बातका स्पष्टीकरण करना है वह यह है कि मूल प्रकृतियोंमें परस्पर संक्रम नहीं होता, इसलिए यहाँ पर मूलप्रकृतिअनुभागसंक्रमके लक्षण कथनके प्रसंगसे वह अपकर्षण और उत्कर्षण इनके आश्रयसे होता है यह कहा है। किन्तु उत्तर प्रकृतियोंमें अपनी जातिके भीतर परस्पर संक्रम होनेमें कोई बाधा नहीं है , इसलिए उसके लक्षण कथनके प्रसङ्गसे वह अपकर्षण, उत्कर्षण और परप्रकृतिसंक्रम इन तीनोंके आश्रयसे होता है यह कहा है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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