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________________ ६६ ६७ 55 ११२ [21] विषय पृष्ठ विषय स्थानसंज्ञाका , २१ जघन्य अनुभागसंक्रम अल्पबहुत्व मोहनीयके अवान्तर भेदोंमें दोनों संज्ञाओंका नरकगतिमें जघन्य अनुभागसंक्रम अल्पबहुत्व ८८ विचार २१ शेष गतियों में नरकगतिके समान जाननेकी सूचना ६२ गतिश्रादि मार्गणाओंके श्राश्रयसे दोनों संज्ञाओं एकेन्द्रियोंमें जघन्य अनुमागसंक्रम अल्पबहुत्व ६२ का विचार २४. भुजगारअनुभागसंक्रम सर्वसंक्रम श्रादि ६ अनुयोगद्वारों को अनुभागविभक्तिके समान जाननेकी सूचना २६ १३ अनुयोगद्वारोंकी सूचना स्वामित्वके कहने प्रतिज्ञा. अर्थपदके कहनेकी प्रतिज्ञा उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम स्वामित्व भुजगारपदका अर्थ जघन्य अनुभागसंक्रम स्वामित्व अल्पतरपदका अर्थ एक जीवकी अपेक्षा काल ३६ अवस्थितपदका अर्थ उत्कृष्ट अनुभाग संक्रम काल अवक्तव्यपदका अर्थ जघन्यअनुभाग संक्रमकाल समुत्कीर्तना श्रादेश प्ररूपणा स्वामित्व ६७ एकजीवकी अपेक्षा अन्तर एक जीवकी अपेक्षा काल ४८ १०० उत्कृष्ट अनुभाग संक्रम अन्तर एक जीवकी अपेक्षा अन्तर १०७ श्रादेशप्ररूपणाको अनुभागविभक्तिके समान . भंगविचय जाननेकी सूचना ५२ भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र और स्पर्शनको जघन्य अनुभागसंक्रम अन्तर अनुभागविभक्तिके समान जाननेकी सूचना ११४ अादेशप्ररूपणा नाना जीवांकी अपेत्रा काल ११४ सन्निकर्षके कहनेकी प्रतिज्ञा नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम सन्निकर्ष भाव ११६ जवन्य अनुभागसंक्रम सनिकर्ष अल्पबहुत्व ११६ नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय पदनिक्षेप उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम भंगविचय ६६ ३ अनुयोगद्वारोंके कहनेकी सूचना जघन्य अनुभागसंक्रम भंगविचय प्ररूपणा १२२ भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र और स्पर्शनको उत्कृष्ट स्वामित्व अनुभागविभक्ति के समान जाननेका सूचना जघन्य स्वामित्व नाना जीवोंकी अपेक्षा काल उत्कृष्ट अल्पबहुत्व १३८ उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम काल जघन्य अल्पबहुत्व १४० जघन्य अनुभागसंक्रम काल नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरउत्कृष्ट अनुभागसंक्रम अन्तर ३ अनुयोगद्वारोंके कहनेकी सूचना १४३ जघन्य अनुभागसंक्रम अन्तर समुत्कीर्तना स्वामित्व भाव १४७ अल्पबहुत्व अल्पबहुत्व उत्कृष्ट अनुभागसंक्रम अल्पबहत्वको उत्कृष्ट स्थान अनुभागविभक्तिके समान जाननेकी सूचना ८३ चार अनुयोगद्वारोंके कहनेकी सूचना १५६ ११४ ७० वृद्धि १४३
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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