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________________ १६४ जयधवलास कसायपहिदेाहुडे [ बंधगी ६ पुणो अनंतापु० विसंजोएदि तस्स चरिमे डिट्ठदिखंडए चरिमसमय ० संकाम० तस्स उक० पदेस ० संक० । तिन्हं वेदाणमेवं चेत्र । णवरि पूरिदकम्मंसिओ मणुसे सुववज्जावेयव्त्रो । ९६३. अणुद्दिसादि सा त्ति मिच्छ० सम्म मि० उक्क० पदेससंक० कस्स ? जो गुणिदकम्मंसिओ संखेज्जतिरियभवपरिब्भमणं काढूण मणुसेसु उत्रवण्गो, सन्चल हुँ सम्म पडिव०, अविणट्ठासु गुणसेढीसु मदो देवेसु उबवण्गो तस्स पढमसमयववण्ण०तस्स उक्क० पदे०सं० | सोलसक० - उण्णोक० एवं चैत्र । णरि देवेषु उपवजिऊग अंतोमुहुत्तं अताणु० चउक विसंजोएदि तस्स चरिभे ट्ठिदिखंडए चरिमसमयसंका ० तस्स उक्क० पदे ० संक० । एवं तिन्हं वेदाणं । णवरि पूरिदकम्मंसिओ मणुसेसु उववज्जावेदव्वो । एवं जाव अणाहारि ति । 1 एवमुक्क० सामित्तं समत्तं । * एत्तो जहएएबं । ९६४ तो उवरि जहण्णयं सामित्तमहिकयं ति अहियार संभालणवकमेदं । * मिच्छत्तस्स जहण्णओ पदेस संकमो कस्स ? ६५. सुगमं । संक्रम करनेके अन्तिम समयमें उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। तीन वेका इसी प्रकार उत्कृष्ट स्वामित्व जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि पूरित कर्मशिक जीवको मनुष्योंमें उत्पन्न कराना चाहिए । ९६३. अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितक के देवों में मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? जो गुणितकर्मशिक जीव तिर्यब्चोंके संख्यात भवोंमें परिभ्रमण करके मनुष्योंमें उत्पन्न हो अतिशीघ्र सम्यत्वको प्राप्त हुआ । पुनः गुणश्रेणियोंके नष्ट होनेके पूर्व ही मरकर देवोंमें उत्पन्न हुआ, प्रथम समयमें उत्पन्न हुए उस देवके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है । सोलह कषाय और छह नोकपायोंका उत्कृष्ट स्वामित्व इसी प्रकार जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि जो देवोंमें उत्पन्न होकर अन्तर्मुहूर्त में अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसंयोजना करता है उसके अन्तिम स्थितिकाण्डकके संक्रम करनेके अन्तिम समय में उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। इसी प्रकार तीन वेदोंका उत्कृष्ट स्वामित्व जानना चाहिये । इतनी विशेषता है कि पूरित कर्माशिक जीवको मनुष्यों में उत्पन्न कराना चाहिए। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । इस प्रकार उत्कृष्ट स्वामित्व समाप्त हुआ । * आगे जघन्य स्वामित्वको कहते हैं । ६ ६४. इससे श्रागे जघन्य स्वामित्व अधिकृत है इस प्रकार यह वचन अधिकारकी संम्हाल करता है । * मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रम किसके होता है ? ९ ६५. यह सूत्र सुगम है ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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