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________________ १८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ $ ५४. सुगमं । * गुणिदकम्मसिनो सव्वलहुं खवणाए अन्भुट्टिदो अंतरं से काले कादृण लोहस्स असंकामगो होहिदि त्ति तस्स लोहस्स उकस्सो पदेससंकमो। ६५५. एदस्स सुत्तस्सत्थो वुच्चदे । तं जहा—जो गुणिदकम्मंसिओ सत्तमपुढवीए दव्यमुक्कस्सं कादूण समयाविरोहेण मणुसगइमागंतूण तत्थ तप्पाओग्गसंखेजवस्समेतदोमणुसभवग्गहणेसु चत्तारि वारे कसाए उवसामेऊण तदो सबलहुं खवणाए अब्भुढिदो तस्स अणियट्टिकरणं पविट्ठस्स अंतरकरणं कादण से काले लोहस्सासंकामगो होहिदि ति एदम्मि अवत्थाविसेसे वट्टमाणस्स लोहसंजलणपदेससंकमो उत्तस्सओ होइ, अधापवत्तसंकमेण तत्थ दिवड्डगुणहाणिमेत्तगुणिदकम्मंसियसमयपबद्धाणमसंखेजदिभागस्स सेससंजलणाणमु वरि संकंतिदसणादो। किमट्ठमेसो चत्तारि वारे कसायोवसामणाए पयट्टाविदो १ ण, तत्थाबज्झमाणणqसयवेदारइ-सोगादिपयडीणं गुणसंकमदव्वपडिग्गहणटुं तहाकरणादो। तं कधमेदेण सुत्तेणाणुवइट्ठमेदं चदुक्खुत्तो कसायाणमुवसामणं लब्भदे ? ण, वक्खोणादो तदुवलद्धीए उवरि भणिस्समाणुकस्सवड्डिसामित्तसुत्तबलेण च तदवगमादो। ६५४. यह सूत्र सुगम है। * जो गुणितकमांशिक जीव क्षपणाके लिए उद्यत हो करके तदनन्तर समयमें लोभका असंक्रामक हो जायगा उसके इस अवस्थामें रहते हुए लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। ६५५. अब इस सूत्रका अर्थ कहते हैं। यथा-जो गुणितकमांशिक जीव सातवीं पृथिवीमें उत्कृष्ट द्रव्य करके समयके अविरोधपूर्वक मनुष्य गतिमें आकर और वहाँ पर तत्प्रायोग्य संख्यात वर्षप्रमाण कालके भीतर दो मनुष्यभवोंको ग्रहण करके उनमें रहते हुए चार बार कषायांका उ करके अनन्तर अतिशीघ्र क्षपणाके लिए उद्यत हो तथा अनिवृत्तिकरणमें प्रवेशपूर्वक अन्तरकरण करके अनन्तर समयमें लोभका असंक्रामक होगा उसके इस विशेष अवस्थामें रहते हुए लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है, क्योंकि वहाँ पर अधःप्रवृत्तसंक्रमके द्वारा डेढ़ गुणहानिगुणित सत्कर्मरूप समयप्रबद्धोंके असंख्यातवें भागका शेष संज्वलनोंके ऊपर संक्रम देखा जाता है। शंका-इसे चार बार कषायोंकी उपशामनारूपसे किसलिए प्रवृत्त कराया है। समाधान नहीं, क्योंकि वहाँ पर नहीं बँधनेवाली नपुंसकवेद, अरति और शोक आदि प्रकृतियोंके गुणसंक्रमके द्वारा द्रव्यको ग्रहण करनेके लिए वैसा किया है। __ शंका-इस सूत्रमें तो यह बात नहीं कही गई है फिर यह चार बार कषायोंकी उपशामना कैसे प्राप्त होती है ? समाधान नहीं, क्योंकि एक तो व्याख्यानसे उसकी उपलब्धि होती है। दूसरे आगे कहे जानेवाले उत्कृष्ट वृद्धिसम्बन्धी स्वामित्वषिषयक सूत्रके बलसे इसका ज्ञान होता है।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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