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________________ जयधवला सहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ पयदुक्कस्ससामित्ताहिसंबंधो त्ति । किं कारणमेत्थेवुक्कस्ससा मित्तं जादमिदि चे ९ सम्मत्तस्स तदवत्थाए मिच्छत्तगुणणिबंधण मधापवत्तसंकमपजाएण सव्वुक्कस्सएण परिणमणदंसणादो | संप दस्सेवत्थस्स फुडीकरणमुत्तरं सुत्ताबयवमाह - १८० * सी वुण अधापवत्तसंकमो । ३७. सो वुण सामित्तसमयभाविओ अधापवत्तसंकमो चेत्र णाण्णो । कुदो एवं १ बंधसंबंधाभावे व सहावदो चेव सम्मत्त - सम्मामिच्छत्ताणं मिच्छाइट्ठिम्मि अंतोमुहुत्त - मेत्तकालमधापवत्तसंकमपवुत्तीए संभवबभ्रुवगमादो । एदेणुव्वेल्लणचरिमफालीए सामित्त - विहाणासंका पडिसिद्धा, अधापवत्तभागहारादो उब्वेल्लणकालब्भंतरणाणागुणहाणिसला गाणमण्णोष्णब्भत्थरासीए असंखेअगुणत्ता दो । तं कुदोवगम्मदे १ एदम्हादो चेव सुत्तादो | एत्थ सामित्तविसईकयदव्बस्स पमाणाणुगमे कीरमाणे दिवङ्कगुणह। णिगुणिदुकस्ससमयपबद्धं ठविय तत्तो गुणसंकमेण सम्मत्तस्सुवरि संकंतदव्वमिच्छामो त्ति किंचूणचरिमगुणसंकमभागहारो तस्स भागहारत्तेण ठवेयव्त्रो । पुणो तत्तो पढमसमयमिन्छाइड्डिणा अधापवत्तेण संकामिददव्त्रमिच्छामो त्ति अधापवत्तसंकमभागहारो वि तस्स भागहारत्तेण ठवेयन्त्रो । एवं उदीरणा करता हुआ प्रथम समयबर्ती मिथ्यादृष्टि हो गया उस प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टिके प्रकृत उत्कृष्ट स्वामित्वका सम्बन्ध होता है । शंका-यहीं पर उत्कृष्ट स्वामित्व प्राप्त हुआ इसका क्या कारण है ? समाधान—क्योंकि उस अवस्था में मिथ्यात्वगुणनिमित्तक सर्वोत्कृष्ट अधःप्रवृत्त संक्रमरूप पर्यायके द्वारा सम्यक्त्वके द्रव्यका मिथ्यात्वरूपसे परिणमन देखा जाता है । * और वह अधःप्रवृत्तस क्रम होता है । ३७. और वह स्वामित्व के समय होनेवाला अधःप्रवृत्तसंक्रम ही है, अन्य नहीं । * शंका — ऐसा क्यों होता है ? समाधान —क्योंकि बन्धका सम्बन्ध नहीं होने पर भी स्वभावसे ही सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व के मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में अन्तर्मुहूर्त काल तक अधःप्रवृत्तसंक्रमकी प्रवृत्तिकी सम्भावना स्वीकार की गई है। इस द्वारा उनकी अन्तिम फालिकी अपेक्षा स्वामित्वके विधानकी आशंकाका निषेध हो गया, क्योंकि अधःप्रवृत्तभागहारसे उद्वेलनाकालके भीतर नानागुणहानिशलाकाओं की अन्योन्याम्यस्त राशि संख्यातगुणी होती है। शंका- वह किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधान — इसी सूत्र से जाना जाता है। यहाँ पर स्वामित्वरूपसे विषय किये गये द्रव्यके प्रमाणका अनुगम करने पर डेढ़ गुणहानिसे गुणित उत्कृष्ट समयबद्धको स्थापित कर उसमें से गुणसंक्रम के द्वारा सम्यक्त्वके ऊपर संक्रान्त हु द्रव्यकी इच्छासे कुछ कम अन्तिम गुणसंक्रम भागहारको उसके भागहाररूपसे स्थापित करना चाहिए। पुनः उसमेंसे प्रथम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि जीवके द्वारा अधःप्रवृत्तके द्वारा संक्रम कराये
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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