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________________ गा०५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे हाणाणि १६५ लोभे विसे । पच्चक्खाणमाणस्स हदसमु०संकमट्ठा० असंखेजगुणाणि । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । पच्चक्खाणमाणस्स हदहदसमुप्पत्तियसंकमट्ठा० असंखेजगुणाणि । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । माणसंअलणस्स बंधसमु०संकमट्ठा० असंखेजगुणाणि । कोहे विसे० । मायाए विसे । लोहे विसे० । माणसंजलणस्स हदसम०संकमट्ठा० असंखेजगुणाणि । कोहे विसे० । मायाए विसेसा० । लोहे पिसे । माणसंजलण० हदहदसमु०संकमट्ठा० असंखेज्जगुणाणि। कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । अणंताणु०माणस्स बंधसमु०संकट्ठा० असंखेजगुणाणि । कोहे विसे० । मायाए विसे० । लोहे विसे० । अर्णताणु०माणस्स हद०समु०संकमट्ठा० असंखेजगुणाणि । कोहे विसे । मायाए विसे० । लोहे विसे० । अणंताणु०माणस्स हदहदसमुप्प०संकमट्ठा० असंखेजगुणाणि । कोहे विसे० । मायाए विसे । लोहे अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानमायाके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानलोभके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानमानके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे प्रत्याख्यानक्रोधके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानमायाके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानलोभके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानमानके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे प्रत्याख्यानक्रोधके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानमायाके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे प्रत्याख्यानलोभके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे मानसंज्वलनके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे क्रोधसंज्वलनके वन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे संज्वलनमायाके बन्धसमत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे संज्वलनलोभके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे मानसंज्वलनके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे क्रोधसंज्वलनके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे मायासंचलनके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे लोभसंज्वलनके हतसमत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे मानसंज्वलनके हतहतसमत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे क्रोधसंज्वलनके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे मायासंज्वलनके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे लोभसंज्वलनके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे अनन्तानुबन्धीमानके बन्धसमसत्तिक संक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे अनन्तानुबन्धीक्रोधके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे अनन्तानुबन्धीमायाके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं । उनसे अनन्तानुबन्धीलाभके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे अनन्तानुबन्धी मानके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे अनन्तानुबन्धीक्रोधके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे अनन्तानुबन्धीमायाके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे अनन्तानन्धीलोभके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं । उनसे अनन्तानुबन्धीमानके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणे हैं। उनसे अनन्तानुबन्धी क्रोधके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। उनसे अनन्तानुबन्धीमायाके हतहतसमुत्पत्तिक
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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