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________________ जयधवलासहिदे कसाय पाहुडे [ बंधगो ६ येत्युच्चारणाणुगतं वत्तस्सा मो— कालागुगमेग दुरिहो गिदेसो । ओग हिदिगो । परिवारसक० - वणोक० अवस० जह० एयसमओ । मतिय विहमिंगो । परि वारसक०- गणोक० अत्त० ओवं । सेसमग्गगल विहत्तियो । I ९ ५४६. अंतरा० दुविहो णि० । ओषेण विविबंगो । पारि र०६० अवत्त० भुज० संक्रमअत्तव्यभंगो | मणुपतिए शुजसं । गगासु णोक० विहतिभंगो | ५५०. णाणाजीवेहिभंगविचओ भागाभागो परिमाणं खेत्तं पोषणं कालो अंतरं भावोति एसिमणिओगद्दाराणं विहत्तिभंगो | णारि सच्चत्य बारसक० - गायक० अ० भुजंगभंग | एमेदेसि सुगमाणमुल्लंघणं कायापरिमं सुतपबंधमाह - १५.० * अप्पाबहु । ६५५१. अहियार संभालणमुत्तमेदं सुगमं । * सव्वत्थोवा मिच्छत्तस्स प्रांतभाग हाणिसंकामया । । व्याख्यान करने के लिए यहाँ पर उच्चारणाका अनुगम करते हैं। कालानुगमले निर्देश दो प्रकारका हैओ और आदेश | ओघ से अनुभागविभक्ति के समान भङ्ग है। इतना है कि बारह वाय और नौ नोकषायों के अवक्तव्य संक्रमका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । मनुष्यत्रिकों अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि वाह काय और नौ नोकपायोंके अवक्तव्यसंक्रमका भङ्ग के समान है । शेष मार्गणाओं में अनुभागविभक्ति के समान भङ्ग है । विशेषार्थ — अनुभागविभक्ति में बारह कपाय और नौ नोकपयोंका अवक्तव्यपद सम्भ नहीं है जो यहाँ से बन जाता है। इसलिए यहाँ श्रोप्ररूपणा में और मनुष्यत्रिकों इस पदका काल अलग से कहा है । शेष कथन स्पष्ट ही है । ९ ५४६. अन्तरानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है - ओ और आदेश । प्रोसे अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग हैं । इतनी विशेषता है कि ओपसे बारह कषाय और नौ नोकपायों के अवक्तव्य संक्रमका भङ्ग भुजगार संक्रमके अवक्तव्यपदके समान है। मनुष्यत्रिकों भुजगार संक्रामक के समान भङ्ग है। शेष मार्गला अनुभागविभक्तिके समान भक्त है। ५५०. नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय, भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र, और भाव इन अनुयोगद्वारों का अनुभागविभक्ति के समान है । बारह कपाय और नौ नोकायोंके वक्तव्य संक्रमका भङ्ग भुजगार संक्रामक है । इस प्रकार अत्यन्त सुगम इन अनुयोगद्वारोंका उल्लंधन करके अल्पबहुत्वका कथन करने के लिए आगे सूत्रप्रबन्धको कहते हैं स्पर्शन, काल, अन्तर ता है कि सर्वत्र वक्तव्यपदके समान * अब अल्पबहुलको कहते हैं । ६५५१. अधिकारकी सम्हाल करनेवाला यह सूत्र सुगम है । * मिथ्यासकी अनन्तभागहानिके संक्रामक जीन रावसे स्तोक हैं ।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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