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________________ गा०५८ ] उत्तरपयडिप्रणुभागसंकमे वड्डीए समुक्कित्ता १४५ एवमवट्ठाणसंकमस्स विसंभवो वत्तव्त्रो, वड्डि-हाणिविसय सव्त्रत्थोवावड्डाणपसरस्स पडिसेहाभावादो । अत्तव्वपदमेत्थ ण संभइ, मिच्छत्ताणुभागविसर तदवलंभादो । *सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणमत्थि अांतगुणहाणी अवट्ठाणमवत्त व्वयं च । · चाहिए, क्योंकि वृद्धि और हानिरूप दोनों स्थानोंपर सर्वत्र ही अवस्थानके होने का निषेध नहीं है । अवक्तव्यपद यहाँ पर सम्भव नहीं है, क्योंकि मिथ्यात्व के अनुभागका आलम्लन लेकर उसकी उपलब्धि नहीं होती । विशेषार्थ – यहाँ पर मिध्यात्व के अनुभागसंक्रम में छह वृद्धियाँ, छह हानियाँ और अवस्थान संक्रम कैसे सम्भव है इसका ऊहापोह किया है। उनमेंसे छह वृद्धियोंका व्याख्यान अनुभागविभक्तिके समय कर आये हैं, इसलिए यहाँ पर छह हानियोंका ही मुख्य रूपसे विशेष विचार किया है। यहाँ पर जो कुछ कहा गया है उसका सार यह है कि जो उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म है उसको यदि घात किया जाय तो ऊपरसे घात करते हुए नीचे की ओर आया जायगा । उसमें भी सबसे जघन्य अनुभागकाण्डक अन्तिम ऊर्वक प्रमाण होगा। उससे बड़ा अनुभागकाण्डक चरम और द्विचरम ऊ प्रमाण होगा। इस प्रकार उत्तरोत्तर एक एक ऊर्वकस्थानके द्वारा अनुभागकाण्डकका प्रमाण बड़ाते हुए जब तक काण्डकप्रमारण अर्थात् आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण उर्वकस्थान नीचे उतरकर असंख्यातभागवृद्धिस्थान नहीं मिलता तब तक अनन्तभागहानि ही होती रहती है । यहाँ हानिका प्रकरण है, इसलिए ऊपरसे नीचे की ओर गये हैं और यही पश्चादानुपूर्वी है । यहाँ इतना विशेष समझना चाहिए कि यहाँ पर अनन्तभागहानिमें जो अनुभागकाण्डकका प्रमाण कहा है सो अन्तिम प्रमाण भी हो सकता है, चरम और द्विचरम ऊर्वकप्रमाण भी हो सकता है, चरम द्विचरम और त्रिचरम ऊर्वकप्रमाण भी हो सकता है और इस प्रकार उत्तरोत्तर अनुभागकाण्डकके प्रमाणमें वृद्धि करते हुए वह आवलिके असंख्यातवें भागके बर! बर चरमादि ऊर्वकप्रमाण भी हो सकता है । इतने ऊ प्रमाण अन्तिम अनुभागका घात होने तक अनन्तभागहानि ही होती है। हाँ इससे अधिक अनुभागका घात करने पर असंख्यातभागहानिका प्रारम्भ होता है जो जब तक संख्यात भागहानि स्थाननहीं प्राप्त होता है तब तक जाती है । उसके बाद संख्यातभागहानिका प्रारम्भ होता है जो जब तक संख्यातगुणहानिस्थान नहीं प्राप्त होता तब तक जाती है। यह संख्यात हानिस्थान कितने स्थान नीचे जाने पर उत्पन्न होता है इसकी मीमांसा करते हुए बतलाया है। कि जहाँके संख्यातभागहानिका प्रारम्भ हुआ है वहाँसे उत्कृष्ट संख्यातके साधिक अर्धभागप्रमाण संख्यात भागवृद्धि के विकल्प कम करने पर यह संख्यातगुणहानिस्थान उत्पन्न होता है। इससे आगे जब तक आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण संख्यातगुणहानियाँ होकर असंख्यातगुणहानि नहीं उत्पन्न होती है तब तक अनुभागकाण्डकघात संख्यातगुणहानिका ही विषय रहता है । उसके आगे अन्तिम अष्टाङ्कस्थानके पूर्व तक जितना भी अनुभागकाण्डकघात है वह सब असंख्यात गुणहानिका विषय रहता है । उसके आगे यदि अन्तिम अष्टाङ्कके साथ काण्डकघात करता है तो अनन्तगुणहानिका प्रारम्भ होता है । यहाँसे श्रागे जितना भी घात है वह सब अनन्तगुणहानिका ही विषय है । परन्तु यहाँ पर इतना विशेष समझना चाहिए कि काण्डकघातके द्वारा पूरे अनुभागका घात नहीं होता । यहाँ पर वृद्धियों और हानियोंके जितने स्थान उत्पन्न होते हैं उतने ही अवस्थानविकल्प भी बन जाते हैं । मात्र मिध्यात्वके अनुभागका अवक्तव्यसंक्रम कभी नहीं होता, क्योंकि इसके संक्रमका अभाव होकर पुनः संक्रमकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है । *सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अनन्तगुणहानि, अवस्थान और अवक्तव्यपद होते हैं। १६
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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