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________________ १२० [ बंधगो ६ * श्रवट्ठिदसंकामया असंखेजगुणा । ४४४. कुदो ? संकमपाओग्गतदुभयसंतकम्मियमिच्छाइट्ठि- सम्माइट्ठीणं सव्वेसिमेव दो। * सेसाणं कम्माणं सध्वत्थोवा श्रवत्तव्वसंकामया । जयधवलासहिदे कसायपाहुडे § ४४५. कुदो ! बार सकसाय-गणोकसायाणमवत्तव्त्रसंकामयभावेण संखेजाणमुवसामयजीवाणं परिणमणदंसणा दो । अनंताचंधीणं पि पलिदोत्रमा संखेन्जभागमेत्तजीवाणं तब्भावेण परिणदावलंभादो | * अप्पयरसंकामया अतगुणा । ९ ४४६. कुदो ? सन्यजीवाणमसंखेज्जभागपमाणत्तादो । * भुजगार संकोमया असंखेजगुणा । ६ ४४७. गुणगारपमाणमेत्थ अंतोमुहुत्तमेतं संचयकालानुसारेण साहेयब्बं । * अवद्विदसंकामया संखेज्जगुणा । ९ ४४८. कुदो भुजगारकालादो अवदिकालस्स तावदिगुणत्तोवलंभादो । raमोघो समत्तो । ९ ४४६. आदेसेण मणुसेसु मिच्छ० सव्वत्थोवा अप्पयर संकामघा । भुजगारसंका ० * उनसे अवस्थितसंक्रामक जीव असंख्यातगुणे हैं । ४४४. क्योंकि जिनके संक्रमके योग्य उक्त दोनों कर्मोंकी सत्ता है ऐसे मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि सभीका यहाँ पर ग्रहण किया है । * शेष कर्मों के अवक्तव्य संक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं । ९ ४४५. क्योंकि बारह कषाय और नौ नौकषायोंके वक्तव्यपदके संक्रमभावसे परिणत हुए संख्यात उपशामक जीव देखे जाते हैं। तथा अनन्तानुबन्धियोंके भी वक्तव्यसंक्रमसे परिणत हुए पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण जीव उपलब्ध होते हैं । * उनसे अल्पतरसंक्रामक जीव अनन्तगुणे हैं । § ४४६. क्योंकि ये सब जीवों के श्रसंख्यातवें भागप्रमाण हैं । * उनसे भुजगारसंक्रामक जीव असंख्यातगुणे हैं । § ४४७. यहाँ पर गुणाकारका प्रमाण अन्तर्मुहूर्त सञ्चयकालके अनुसार साध लेना चाहिए । * उनसे अवस्थितसंक्रामक जीव संख्यातगुणे हैं । § ४४८. क्योंकि भुजगारपदके कालसे अवस्थितपदका काल संख्यातगुणा पाया जाता है । इसप्रकार श्रोघप्ररूपणा समाप्त हुई । ९ ४४६. देशसे मनुष्योंमें मिथ्यात्वके अल्पतरसंक्रामक जीब सबसे स्तोक हैं। उनसे
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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