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________________ १०५ गा० ५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे भुजगारसंकमस्स एयजीवेण कालो ॐ अवट्ठिदसंकामो केवचिरं कालादो होइ ? ६ ३७०. सुगमं। * जहपणेण अंतोमुहुत्तं । ६३७१. चरिमाणुभागखंडयुक्कीरणद्धाए तदुधलंभादो। * उकसेण वेछावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ६३७२. एदस्स सुत्तस्स अस्थपरूवणा सुगमा, सम्मत्तस्सेव सादिरेयवेछावद्विसागरोवममेत्तावट्ठिदुक्कस्सकालसिद्धीए पडिबंधाभावादो। * सेसाणं कम्माणं भुजगारं जहणणेण एयसमो। ६ ३७३. सुगमं। * उकसेण अंतोमुहुत्तं। ६ ३७४. अणंतगुणवढ्ढिकालस्स तप्पमाणत्तोवएसादो । ® अप्पयरसंकामो केवचिरं कालादो होइ ? ६ ३७५. सुगमं । * जहएणुकसेण एयसमो । ६३७६. एदं पि सुगमं । एदेण सामण्णणिहेसेण पुरिसवेद-चदुसंजलणाणं पि अप्पयर * अवस्थितसंक्रामकका कितना काल है ? ६ ३७०. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है। ६३७१. क्योंकि अन्तिम अनुभागकाण्डकके उत्कीरण कालके भीतर यह काल उपलब्ध होता है। * उत्कृष्ट काल साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण है। ६३७२. इस सूत्रकी अर्थप्ररूपणा सुगम है, क्योंकि सम्यक्त्वके समान इसके अवस्थितपदके साधिक दो छयासठ सागरप्रमाण कालकी सिद्धि होनेमें कोई रुकावट नहीं आती। * शेष कर्मो के भुजगारसंक्रामकका जघन्य काल एक समय है । ६ ३७३. यह सूत्र सुगम है। * उत्कृष्ट काल अन्तमुहूर्त है। ६३७४. क्योंकि अनन्तगुणवृद्धिका उत्कृष्ट काल तत्प्रमाण है ऐसा आगमका उपदेश है। * अल्पतरसंक्रामकका कितना काल है ? ६३७५. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है। ६ ३७६. यह सूत्र भी सुगम है। यह सामान्य निर्देश है। इससे पुरुषवेद और चार १४
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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