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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ बंधगो ६ अवत्तव्त्रसंकामओ होतॄण तदियादिसमएस अवद्विदसंकमं कुणमाणो उक्समसम्मत्तद्धाक्खएण मिच्छत्तं गदो । पलिदोत्रमासंखेजभागमेत्तकाल मुव्वेल्लणपरिणामेणच्छिदो चरिमुच्वेल्लगफालीए सह उबसमसम्मत्तं पडिवण्णो पुणो वेदयभावेण पढमछावट्टिमणुपलिय तदवलाणे मिच्छत्तेण पलिदोत्रमासंखेज्जभागमे तकालमट्ठिदसंकभेणच्छिदो पुत्रं व सम्मत्तपडिलंभेण विदियछात्रमगुपालेण तदवसाणे पुणो त्रि मिच्छत्तं गंतव्बेल्ल गाचारिमफालीए अदिसंकमस्स पञ्जवसाणं करेदि, तेण लद्धो पयदुकस्सकालो तीहि पलिदो० असंखे० भागेहि सादिरेयवेछावट्टिसागरोवममेत्तो । १०४ * अवत्तव्वसंकामत्र केवचिरं कालादो होइ ? ९ ३६७. सुगमं । * जहणणुक्कस्सेण एयसमत्रो । ९ ३६८. असंक्रमादो संक्रामयभावमुवगयपढमसमए चैव तदुवलंभणियमादो । * सम्मामिच्छत्तस्स अप्पयर अवन्त्तव्वसंकामत्रो केवचिरं कालादो होइ ? जहण्णुक्कस्से एयसमयं । ९ ३६६. अवत्तव्त्रसंका मयस्स एयसमओ सम्मत्तस्सेव परूत्रेयन्त्रो । अप्पयरसंकामयस्स विदंसणमोहक्खणा अणुभागखंडयघा दाणंतरमेयसमयसंभवो ददुव्वो । समय में वक्तव्यपदका संक्रामक हुआ । पुनः तृतीय आदि समयों में अवस्थितसंक्रमको करता हुआ उपशमसम्यक्त्व कालका क्षय होनेसे मिध्यात्व में गया और पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण काल तक उनारूप परिणामसे परिणत हुआ । फिर अन्तिम उद्व ेलना फालिके साथ उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ। पुनः वेदकसम्यक्त्व के साथ थम छयासठ सागरप्रमाण कालको विताकर उसके अन्तमें मिध्यात्वमें जाकर पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कालतक अवस्थित संक्रमके साथ रहा । तथा पहलेके समान सम्यक्त्वको प्राप्त करके दूसरे छयासठ सागर काल तक सम्यक्त्वा पालन करके उसके अन्तमें मिथ्यात्व में जाकर उद्वेलनाकी अन्तिम फालिके पतनतक अवस्थित संक्रमके अन्तको प्राप्त हुआ । इस प्रकार इस विधि से प्रकृत उत्कृष्ट काल तीन बार पल्यके श्रसंख्यातवें भागों से अधिक दो छयासठ सागर कालप्रमाण प्राप्त हुआ । * अवक्तव्य संक्रामकका कितना काल है ? ९३६७. यह सूत्र सुगम है । * जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । ९३६८. क्योंकि संक्रम रहित अवस्थासे संक्रामकभावको प्राप्त हुए जीवके प्रथम समय में ही वक्तव्य संक्रमकी प्राप्तिका नियम है । * सम्यग्मिथ्यात्व के अल्पतर और अवक्तव्यसंक्रामकका कितना काल है ? जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है । ९ ३६६. इसके अवक्तव्यसंक्रामकके एक समय कालका कथन सम्यक्त्वके समान ही करना चाहिए। तथा अल्पतर संक्रामकका भी एक समय काल दर्शनमोहनीयकी क्षपणा अनुभ घातके अनन्तर एक समय तक सम्भव है ऐसा जान लेना चाहिए।
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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