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________________ गा० ५८ ] उत्तरपयडिप्रणुभागसंक अप्पा बहु ९३ ६ ३२७. सुगमं । * हस्सस्स जहण्णाणुभागसंकमो अतगुणो । ९ ३२८. कुदो १ सव्त्रघादिविट्ठाणियत्ते समाणे वि संते सम्मामिच्छत्तस्स विसयीकय दारुअसमाणातिमभागमुल्लंघिय परदो एदस्सावट्ठाणदंसणादो । * सेसाणं जहा सम्माइट्टिबंधे तहा कायव्वो । § ३२६. एत्थ सम्माइट्टिबंधे ति णिद्देसेण सम्मत्ता हिमुहसव्वविसुद्धमिच्छा इडिजहण्णबंधस्स गहणं कायव्त्रं, अण्णहा अणंतारणुबंधियादीणं सम्माइट्टिबंधबहिन्भूदाणमप्पात्रहुअविहाणावत्तदो । विसोहिपरिणामोवलक्खणमेत्तं चेदं तेण विमुद्धमिच्छाइट्टिबंधे जारिसमप्पा बहुअं परूविदं तारिसमेवेत्थ सेसपयडीणं कायव्वं, विसोहिणिबंथणसुहुमेह दियहदसमुप्पत्तियकम्मेण लद्धजहण्णभावाणं तब्भावविरोहाभाबादो ति एसो सुत्तन्यसन्भावो । ९ ३३० संपहि तदुच्चारणं वत्तइस्सामो । तं जहा — हस्सजहण्णाणुभागसंकमा दो उवरि रदीए जहणाणुभागसंकमो अनंतगुणो । पुरिसवेदस्स जहण्णा पु० अनंतगुणो । इत्थवेद ० जहण्णाणु० अनंतगुणो । दुगु छा० जहण्णा • अनंतगुणो । भय० जहण्णाणु० अनंतगुणो । सोग० जह० अनंतगुणो । अरदीए जह० अनंतगुणो । णव स० जह० अनंतगुणो । ९३२७. यह सूत्र सुगम है । * उससे हास्यका जघन्य अनुभागसंक्रम अनन्तगुणा है । ९३२८. क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व और हास्य इन दोनोंका जघन्य अनुभागसंक्रम सर्वघाति द्विस्थानिक रूप से समान है तो भी सम्यग्मिथ्यात्व के विषयरूप दारुसमान अनन्तवें भागको उल्लंघन कर आगे इसका अवस्थान देखा जाता है । * शेष प्रकृतियोंके जघन्य अनुभाग संक्रमका अल्पबहुत्व जिस प्रकार सम्यग्दृष्टि किया है उस प्रकार करना चाहिए । § ३२९. यहाँ पर सूत्रमें 'सम्माइटिबंधे' ऐसा निर्देश करनेसे सम्यक्त्वके अभिमुख हुए सर्वविशुद्धमिध्यादृष्टि जघन्य बन्धका ग्रहण करना चाहिए, अन्यथा सम्यग्दृष्टिके बन्धसे बाहर हुए अनन्तानुवन्धी आदिके अल्पबहुत्वका विधान नहीं बन सकता है । यह कथन मात्र विशुद्ध परिणामोंका उपलक्षणरूप है । इसलिए विशुद्ध मिथ्यादृष्टिके बन्धमें जिस प्रकारका अल्पबहुत्व कहा है उसी प्रकारका ही यहाँ पर शेष प्रकृतियोंका करना चाहिए, क्योंकि विशुद्धिनिमित्तक सूक्ष्म एकेन्द्रियसम्बन्धी हतसमुत्पत्तिक कर्मरूपसे जघन्यपनेको प्राप्त हुए उक्त प्रकृतियोंके अनुभागोंका विशुद्ध मिथ्यादृष्टिके बन्धके समान होनेमें कोई विरोध नहीं आता इस प्रकार यह इस सूत्र का अर्थ है । ६ ३३०. अब उसकी उच्चारणाको बतलाते हैं । यथा - हास्य के जघन्य अनुभाग संक्रमसे रतिका जघन्य अनुभागसंक्रम अनन्तगुणा है। उससे पुरुषवेदका जघन्य अनुभागसंक्रम अनन्तगुण है। उससे स्त्रीवेदका जघन्य अनुभाग संक्रम अनन्तगुणा है। उससे जुगुप्साका जघन्य अनुभाग संक्रम अनन्तगुणा है। उससे भयका जघन्य अनुभाग संक्रम अनन्तगुणा है। उससे शोकका जघन्य अनुभागसंक्रम अनन्तगुणा है। उससे अरतिका जघन्य अनुभागसंक्रम अनन्तगुणा है । उससे नपुंसक वेदका जघन्य अनुभागसंक्रम अनन्तगुणा है। उससे अप्रत्याख्यानमानका जघन्य
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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