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________________ गा० ५८ ] उत्तरपयडिश्रणुभागसंकमे गाण जीवेहिं अंतर छम्मासमंतराविय पुणो माण - माया - लोभोदएहिं चढाविय पच्छा सोदयपडिलं मेण सादिरेयवासमेतमंतरमुप्पाएयव्त्रं । एवं माण- मायासंजलणाणं पि पयदुक्कस्संतरं वत्तं । णारि माणसंजणस्स माया -लोभोद एहि मायासंजलणस्स च लोभोदरंग चढाविय अंतरावेयवं । कोहसंजणस्स संपुण्णदोवासमेत्तमंतरं किण्ण जायदे १ ण, सव्वत्थ छम्मासाणं पडिवुष्णासंधाणसरूवेणासंभवादो । एवं चैत्र पुरिसवेदस्स वि सोदएणादि काढूण परोदणंतरिदस्स सादिरेयवासमेत्तुकस्संतरसंभवो ददुव्वो । ८९ * एवंसयवेदस्स जहण्णाणुभागसंकामयंतरमुकस्सेण संखेज्जाणि वासाणि । ९ २६६. जंबुसयवेदोदऍणादि काढूण अणप्पिदवेदोदएण वासपुधत्तमेत्तमंतरिदस्स तदुर्लभादो । * अताणुबंधी जहण्णाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ६२७०. सुगमं । * जहणणेण एयसमओ । ६ २७१. पयदजहण्गाणुभागसंकामयाणमेय समयमंत रिदाणं पुणो वि तदनंतरसमए पादुब्भावविरोहाभावादो | * उक्कस्सेण असंसेज्जा लोगा । करके तथा छह माहका अन्तर करा कर पुनः मान, माया और लोभके उदयसे चढ़ा कर पश्चात् स्वोदयका श्राश्रय करनेसे साधिक एक वर्षप्रमाण अन्तर उत्पन्न करना चाहिए। इसी प्रकार मान और मायासंज्वलनोंका भी प्रकृत उत्कृष्ट अन्तर कहना चाहिए। इतनी विशेषता है कि माननका माया और लोभके उदयसे तथा मायासंज्वलनका लोभके उदयसे चढ़ा कर अन्तर ले आना चाहिए । शंका - क्रोधसंज्वलनका पूरा दो वर्ष प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर क्यों नहीं उत्पन्न होता ? समाधान — नहीं क्योंकि सर्वत्र अनुसन्धानरूपसे पूरे छह माह असम्भव हैं। इसी प्रकार स्वोदयसे अन्तरका प्रारम्भ करके परोदय से अन्तरको प्राप्त हुए पुरुषवेदका मी साधिक एक वर्षप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर सम्भव जानना चाहिए । * नपुंसकवेदके जघन्य अनुभागके संक्रामकोंका उत्कृष्ट अन्तर संख्यात वर्षप्रमाण है । § २६६. क्योंकि नपुंसकवेदके उदयसे अन्तरका प्रारम्भ करके अविवक्षित वेद के उदयसे बर्षपृथक्त्वप्रमाण अन्तरको प्राप्त हुए उसका उक्त प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर उपलब्ध होता है । * अनन्तानुबन्धियोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकोंका अन्तरकाल कितना है ? ६२७०. यह सूत्र सुगम है । * जघन्य अन्तर एक समय है । ६ २७१. एक समयके लिए अन्तरको प्राप्त हुए प्रकृत जघन्य अनुभाग के संक्रामकका फिर भी उसके अनन्तर समयमें प्रादुर्भाव होनेमें कोई विरोध नहीं आता । * उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है । ११
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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