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________________ ८० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ६ ६२६३. सुगमं। मिच्छत्तस्स अट्ठकसायस्स जहणाणुभागसंकामयाणं केवचिरं अंतरं ? ६२६४. सुगमं। * त्यि अंतरं। ६२६५. कुदो ? पयदजहण्गाणुभागसंकामयाणं सुहुमाणं णिरंतरसरूवेण सबकालमवहिदत्तादो। * सम्मत्त-सम्मामिच्छत्त-चदुसंजलण-णवणोकसायाणं जहण्णाणु. भागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ६२६६. सुगमं। ॐ जहरणेणेयसमप्रो। * उक्कस्सेण छम्मासा। ६ २६७. एदाणि दो वि सुत्ताणि सुगमाणि । संपहि एत्थतणविसेसपदुप्पायणदुमुत्तरसुत्तमाह * णवरि तिषिणसंजलण-पुरिसवेदाणमुक्कस्सेण वासं सादिरेयं । ६ २६८. तं जहा–कोहसंजलणस्स उक्कस्संतरे विवक्खिए सोदएणादि कादूण ६ २६३. यह सूत्र सुगम है। * मिथ्यात्व और आठ कपायोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकोंका अन्तरकाल कितना है ? ६ २६४. यह सूत्र सुगम है। * अन्तरकाल नहीं है। ६२६५. क्योंकि प्रकृत जघन्य अनुभागके संक्रामक सूक्ष्म जीव अन्तरके बिना सदा काल अवस्थित रहते हैं। * सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, चार संज्वलन और नौ नोकषायोंके जघन्य अनुभागके संक्रामकोंका अन्तरकाल कितना है ? ६२६६. यह सूत्र सुगम है। * जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है। ६ २६७. ये दोनों ही सूत्र सुगम हैं। अब यहां सम्बन्धी विशेषताका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं..... * इतनी विशेषता है कि तीन संज्जलन और पुरुषवेदका उत्कृष्ट अन्तर साधिक एक वर्ष है। ६२६८. यथा-क्रोधसंजलनका उत्कृष्ट अन्तर विवक्षित होने पर स्वोदयसे अन्तरका प्रारम्भ
SR No.090221
Book TitleKasaypahudam Part 09
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages590
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size19 MB
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