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________________ ७० जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा और उसकी समीक्षा है और न कार्यद्रव्यकी क्रिया ही करती है । ऐसो अवस्थामें उन्हें ययार्थ साधन कहना मार्गमें क्रिसीको लुटता हुआ देखकर 'मार्ग लुटता है' इस कथनको यथार्थ मानने के समान ही है । अपर पक्षने हमारे कथनको ध्यानमें लिये बिना जो कार्य-कारणभावका उल्टा चित्र उपस्थित किया है वह इसलिए ठीक नहीं, क्योंकि न तो उपादानके कारण निमित्त व्यवहारके योग्य बाह्य सामग्रीको उपस्थित होना पड़ता है और न ही निमित्त व्यवहार के योग्य बाह्य सामग्रीके कारण उपादानको ही उपस्थित होना पड़ता है। यह सज योग है जो प्रत्येक कार्य में प्रत्येक समयमें सहज ही मिलता रहता है । 'मैंने अमुक कार्यके निमित्त मिकामे यह भी कथनमात्र है जो पुरुषको योग और विकल्पको लक्ष्य में रखकर किया जाता है 1 वस्तुत: एक द्रव्य दूसरं दध्यकी क्रियाका कर्ता त्रिकालमें नहीं हो सकता । अतः यहाँ हमारे कथनको लक्ष्य में रखकर अपर पक्ष ने कार्य-कारणभावका जो उल्टा चित्र उपस्थित किया है उसे कल्पनामात्र ही जानना चाहिए। हमारा 'उपादानके अनुसार मावलिंग होता है।' यह कथन इसलिए परमार्थभूत है, क्योंकि कर्मफे क्षयोपशम और भावलिंगके एक कालमें होनेका नियम होनेसे उपचारसे यह कहा जाता है कि योग्य क्षयोपशमके अनुसार आत्मामें भावलिंगकी प्राप्ति होती है। जिस पंचास्तिकायका यही अपर पक्षने हवाला दिया है उसी पंचास्तिकाय गाथा ५८ में पहले सब भावोंको कर्मकृत बतलाकर गाथा ५९ में उसका निषेध कर यह स्पष्ट कर दिया है कि आत्माके भावोंको स्वयं आत्मा उत्पन्न करता है, कर्म नहीं । अतः चारित्रमोहनीम कर्मके क्षयोपशमके अनुसार भालिंग होता है इसे यथार्थ कथन न समझकर अपने उपादानके 'अनुसार भावलिंग होता है इसे ही आगमसम्मत यथार्थ कथन जानना चाहिए । इस परसे अपर पक्ष भी स्वयं निर्णय कर सकता है कि यथार्थ कथन अपर पक्ष का न होकर हमारा ही है। आगे अपर पक्षने निमित्त व्यवहारको यथार्थ सिद्ध करनेके लिए सलाहनेके रूपमें जो कुछ भी वक्तव्य दिया है उससे इतना ही ज्ञात होता है कि अपर पक्ष किस नयको अपेक्षा क्या वक्तव्य आगममें किया गया है इस ओर ध्यान न देकर मात्र अपनी मान्यताको आगम बनाने के फेर में है, अन्यथा वह पक्ष असद्भूत व्यवहारनयके वक्तव्यको असद्भूत मानकर इस नयकी अपेक्षा कथन आगममें किस प्रयोजनसे किया गया है उसपर दृष्टिपात करता । विशेष खुलासा हम पूर्वमें ही कर आये हैं, इसलिए यहाँ उन सब तथ्योंका पुनः खुलासा नहीं करते। प्रवचनसार गाथा १६९ को आचार्य अमृतचन्द्र कृत टीकामें 'स्वयं' पद माया है । हमने इसका सर्थ प्रकृत शंकाके प्रश्रम उत्तरमें 'स्वयं' ही किया है। किन्तु अपर पक्षको यह मान्य नहीं । वह इसका अर्थ 'अपने रूप' करता है । इसके समर्थनमें उस पक्ष को मुख्य मुक्ति यह है कि सहकारी कारणके बिना कोई भी परिणति नहीं होती, इसलिए कार्य-कारणभावके प्रसंगमें सर्वत्र इस पदका अर्थ 'अपने रूप या 'अपन में करना ही उचित है । इस प्रकार अपर पक्षके इस कथनसे मालूम पड़ता है कि यह पक्ष उत्पादव्यय-नोव्यस्वरूप प्रत्येक सत्की उत्पत्ति परकी सहायतासे या परसे होती है यह सिद्ध करना चाहता है। किन्तु उस पक्ष को यह मान्यता सर्वथा आगमविरुद्ध है, अतएव जहाँ भी निश्चयनयकी अपेक्षा कथन किया गया है वहां प्रत्येक कार्य यथार्थमें परनिरपेक्ष ही होता है इस सिद्धान्तको ध्यानमें रखकर 'स्वयमेव' पदका 'स्वयं ही' अर्थ करना उचित है । इतना अवश्य है कि यदि विस्तारसे ही इस पक्षका अर्थ करना हो तो निश्मय षट्कारकरूप भी इस पदका अर्थ किया जा सकता है, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य निश्चयमे आप का
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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