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________________ जयपुर (खानिया) तत्वचर्चा और उसकी समीक्षा प० १५० के परिणमनशक्तिलक्षणायाः प्रतिविशिष्टान्तःसामग्याः सुवर्णकारकव्यापारादिलक्षणायाश्च बहिःसामग्र्याः सन्निपाते' पद ध्यान देने योग्य है 1 इस द्वारा कैसी अन्तः सामग्री और कैसी बाह्य सामग्रीका सन्निपात होने पर कैसा उत्पाद होता है यह बतलाया गया है। शादी पही जण होता है कि स्वभावसे द्रव्य उत्पादादि यस्वरूप होनेके कारण अपने परिणामस्वभावके थालम्बन द्वारा यपि इन तीन रूप स्वयं परिणमता है, अन्य कोई उसे इनरूप परिणमाता नहीं है । फिर भी अन्तः-बाह्य सामग्रीके किस म होने पर किस रूप परिणमता है इसकी प्रसिद्धि उससे होती है, अतः सद्भूत व्यवहारनयसे अन्तःसामग्रीको और असद्भूत व्यवहार नयसे बाह्य सामग्रीको उसका उत्पादक कहा गया है । एकको दूसरेका उत्पादक कहना यह व्यवहार है और स्वयं उत्पन्न होता है कहना निश्चय है । अर्थात् निश्चय नयका विषय है। यहां सद्भूत व्यवहारनयका खुलासा यह है कि उपादान और उपादेयका स्वरूप स्वतःसिद्ध होनेपर भी यह नय उपादेयको उपादान सापेक्षा स्वीकार करता है । असद्भूत व्यवहारनयका खुलासा यह है कि बाह्य सामग्री स्वरूपसे अन्यके कार्यका निमित्त नहीं है फिर भी यह नय उसे अन्य बाह्य सामग्री सापेक्ष स्वीकार करता है। ___ यहाँ इन दोनों क्यवहारोंमें हमने उपचरितोपचारकी विवक्षा नहीं की है । उसकी विवक्षामें उपादान उपादेयका उत्पादक है यह कथन उपररित सद्भूत व्यवहारमयका विषय होगा और कुम्भकार घटका कर्ता है यह कयन उपचरित असद्भूत व्यवहारनयका विषय ठहरेगा। अन्यत्र जहाँ कहीं हमने उपादानसे उपादेयकी उपपतिको यदि निश्चयनयका वक्तव्य कहा भी है तो वहाँ अभेद विवक्षामें ही वसा प्रतिपादन किया गया है ऐसा यहाँ समझना चाहिए। यह वस्तुस्थिति है। इसके प्रकाशमें जब हम बाह्य सामग्रीको अपेक्षा विचार करते हैं तो विदित होता है कि कुम्भकारमें जो षट् कारक धर्म हैं वे अपने है, मिट्टीके नहीं। तथा मिट्टी में जो षट् कारक धर्म है वे मिट्टीके है, कुम्भकारके नहीं। अतएव कुम्भकारको अपने कर्तादि पोंके कारण योग और विकल्पका कर्ता कहना तथा मिट्ठीको अपने कर्तादि धर्मोके कारण घटका कर्ता कहना तो परमार्थभूत है । फिर भी जिस समय मिट्टी अपना अटरूप व्यापार करती है उस समय कुम्भकार भी अपना योग और विकल्परूप ऐसा व्यापार करता है जो घट परिणामके अनुकूल कहा जाता है। वस्तुतः यही कुम्भकारमें घटके फर्तापनेके उपचारका हेतु है । इसी तथ्यको समयसार गाथा ८४ को आत्मरूयाति टीका 'कलशसम्भवानुकुल व्यापारं कुर्वाण:कलशकी उत्पत्तिके अनुकूल व्यापारको करता हुआ' इन शब्दोंमें व्यक्त करती है। जैसे बालक सिंहका कार्य तो नहीं करता, फिर भी वह अपने क्रोर्य-शौर्य गुणके कारण सिंह कहने में आता है । यही उपचार है। वैसे ही कुम्भकार मिट्टीमें घटक्रिया तो नहीं करता, फिर भी वह मिट्टी द्वारा की जानेवाली घदक्रियाक समय अपनी योग और विकल्परूप ऐसी क्रिया करता है जिससे उसे मिट्टीमें घट क्रियाका कर्ता कहा जाता है । यही चपचार है। हमें विश्वास है कि अपर पम पूर्वोक्त उदाहरण द्वारा आगम प्रमाणोंके प्रकाशमें इस तथ्य को ग्रहण करेगा। __ अपर पक्षने उपचार कहाँ प्रवृत्त होता है यह दिखलानेके लिए जो अन्य दो उदाहरण प्रस्तुत किये हैं उनका प्राशय भी यही है । अन्न अपने परिणाम लक्षण क्रियाका कर्ता है और प्राण अपने परिणाम लक्षण क्रियाके कर्ता है । ये परस्पर एक-दूसरेको क्रिया नहीं करते। फिर भी कालप्रत्यासत्ति वंश यहाँ अन्नमें प्राणोंकी निमित्तता उपचरित की गई है। अतएव अन्न जैसे प्राणोंका उपचरित हेतु है उसी प्रकार प्रकृतमें
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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